2020-07-18-2

Pavan K Varma

18th July 2020

भारत के महान अतीत और विज्ञान में कोई द्वंद्व नहीं: कलम कोलकाता में पवन के. वर्मा

कलम कोलकाता यानी प्रभा खेतान फाउंडेशन के मुख्यालय पर आयोजित शब्दों का उत्सव। पश्चिम बंगाल की शस्य श्यामला भूमि पर संध्या के समय जब पश्चिम में सूरज अस्त हो रहा था, तब बौद्धिकजनों और भद्र लोगों के बीच कलम कोलकाता के आयोजन में विचारों का सूर्य उदित हो रहा था। अतिथि वक्ता के रूप में आमंत्रित थे आईएफएस अधिकारी रहे लेखक पवन के. वर्मा। उनसे बातचीत के लिए मौजूद थे, बिशंभर नेवर। स्वागत निलिशा अग्रवाल ने किया। अग्रवाल ने प्रभा खेतान फाउंडेशन की इस पहल का परिचय देते हुए कहा, "'अपनी भाषा अपने लोग' वह संचालक मंत्र है, जिससे कलम की अवधारणा को आकार मिला- और हिंदी लेखकों के साथ संवाद के लिए समर्पित सत्र का आरंभ हुआ। फाउंडेशन अपने साहित्यिक प्रयासों के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में अथक प्रयास कर रहा है। कलम और इस तरह के कई उपक्रम शब्दों के जानकारों के साथ-साथ साहित्य के प्रेमियों को एक मंच प्रदान करने के लिए निर्मित किए गए हैं। पुस्तक प्रेमियों की सुरक्षा के मद्देनज़र इन सत्रों को ‘वर्चुअल' कर दिया गया है।" इसके बाद उन्होंने आमंत्रित अतिथि लेखक पवन के. वर्मा का संक्षिप्त परिचय दिया। कई देशों में कूटनीतिज्ञ और विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रहे वर्मा अंग्रेजी में लिखते हैं, पर हिंदी सहित दूसरी भारतीय भाषाओं में भी अनूदित होकर उनकी किताबें उपलब्ध हैं। ऐसी पुस्तकों में द ग्रेट इंडियन मिडल क्लास', 'गालिब: द मैन, द टाइम्स', 'कृष्णा: द प्लेफुल डिवाइन', 'युधिष्ठिर एंड द्रौपदी: ए टेल ऑव लव', 'बीइंग इंडियन', 'बिकमिंग इंडियन', 'द न्यू इंडियन मिडल क्लास', 'व्हेन लॉस इज गेन', 'श्रीकृष्णा अवतार', 'आदि शंकराचार्य-हिंदू धर्म के महानतम विचारक' और 'द ग्रेटेस्ट ऑड टू लॉर्ड रामा' जैसी पुस्तकें शामिल हैं।

बातचीत की शुरुआत बिशंभर नेवर ने वर्मा के इंद्रधनुषी लेखन की चर्चा से की और इस विविधता को महत्त्व देने के पीछे की वजह जाननी चाही। वर्मा ने कहा, “मैं भारत की सांस्कृतिक जड़ों को जानने-पहचानने के साथ ही आज क्या हो रहा है, इस पर भी नज़र जमाए रहा।“ कृष्ण, चाणक्य, राम, गालिब पर लिखी अपनी पुस्तकों और उस उपन्यास की चर्चा करते हुए वर्मा ने कहा, "एक विषय से दूसरे विषय पर जाने का मतलब विषय को समझना था। सांस्कृतिक विरासत को खंगालने के दौरान पुस्तकें बनीं। यह रैंडम नहीं है।" सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े सवाल के जवाब में वर्मा का उत्तर था, "उपनिवेश के बाद वाला जो समाज है, अभिजात्य और भद्र लोक, वह अपनी संस्कृति से शिफ्ट कर जाता है। यह वर्ग एक फोटो कॉपी के रूप में सामने आते हैं। वे अपनी सांस्कृतिक विरासत को नहीं समझते हैं।" आदि शंकराचार्य और ग़ालिब पर अपनी पुस्तकों के लेखन के दौरान के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया, “लोगों ने शेक्सपीयर को तो पढ़ा है, कालिदास को नहीं पढ़ा। हिंदू दर्शन में कितनी बुनियादी पुस्तके हैं, कितने मत हैं, इन की जानकारी न भी हो तो जिज्ञासा तो होनी चाहिए।“ सेंट कोलंबस, सेंट जेवियर और सेंट स्टीफेंस जैसे शैक्षणिक संस्थानों का जिक्र करते हुए वर्मा ने कहा, "कभी-कभी व्यक्ति अंग्रेजी तो बोल लेता है, पर अपनी भाषा अपनी संस्कृति से अलग हो जाता है, जो कि नहीं होना चाहिए। खास तौर से भारत जैसे देश के लिए यह बहुत दुखद बात है।"

कृषि और धर्म प्रधान देश में भूख, गरीबी जैसे मूल प्रश्न से अलग धर्म के नाम पर आम आदमी की समस्याओं को दरकिनार क्यों किया जा रहा? के जवाब में वर्मा का कहना था, "धर्म और मजहब को जोड़ना नहीं चाहिए। हिंदू संस्कृति में धर्म और मजहब में अंतर है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में धर्म मजहब नहीं है। धर्म है सही आचरण। हिंदू धर्म और दर्शन में कोई टेन कमांड नहीं है। हिंदू धर्म, सभ्यता और संस्कृति हर व्यक्ति को सोचने की छूट देता है। सही गलत को सोचने की छूट देता।" उन्होंने कहा, "अधिकांश हिंदू अपने धर्म और उसके दार्शनिक बोध को नहीं समझ पाता। इसीलिए लोग इसका गलत इस्तेमाल करने में लगे हैं। जय श्री राम का नारा लगाने वाले क्या श्री राम के आदर्श को जानते हैं?" उन्होंने तुलसीदास जी रचित 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई' का जिक्र करते हुए कहा, "भगवान राम मर्यादा के प्रतीक हैं। उन्होंने अन्याय के खिलाफ युद्ध भी किया, आक्रोश भी किया, पर अकारण नहीं। श्री राम का आचरण इतना श्रेष्ठ था कि कैकेयी, जिन्होंने षड़यंत्र का शिकार होकर, मंथरा की बात सुन श्री राम का राजपाठ लिया, उनसे भी वनगमन जाने से पहले श्री राम मिलने गए तो कहा, 'सुनु जननी सोई सुत बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।' यह मर्यादा पुरुषोत्तम राम की परिभाषा है। वह श्री राम जिनकी हम आराधना करते हैं, वह वे नहीं हैं, जिनका लाभ उठाने वाले प्रयोग करते हैं।"

वर्मा ने 'एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति' का उल्लेख करते हुए यह आह्वान किया कि हिंदू अपने धर्म, सभ्यता और संस्कृति से और जुड़ें। 'वसुधैव कुटुंबकम' से लेकर 'निष्काम कर्म' जैसे गौरवान्वित अतीत से हम बेखबर होते जा रहे हैं। मैं किसी को इसके लिए दोष नहीं देता, पर इस पर हमें सोचने की जरूरत है। धार्मिक कट्टरता पर वर्मा की प्रतिक्रिया थी कि अगर हिंदू फंडामेंटलिज्म गलत है तो मुस्लिम तुष्टीकरण भी गलत है। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि ऐसा हुआ है। मैं खिलाफत मूवमेंट में गांधी जी के फैसले को भी मैं समझ नहीं पाता। इसी तरह यह मेरी समझ से परे है कि नेहरूजी ने सोमनाथ मंदिर पर राजेंद्र बाबू को पत्र क्यों लिखा? पंथ निरपेक्ष का मतलब यह तो नहीं कि हम अपना धर्म छोड़ दें। शाहबानो का मसला हो या कश्मीरी पंडितों का, हमने तुष्टीकरण की नीति अपनाई, जो कि गलत है।

युवा अतीत और भविष्य के बीच की दुविधा में फंसा है? जैसे सवाल पर वर्मा की प्रतिक्रिया थी, "इतिहास में जाना कट्टरपंथी बनना नहीं है। एक कंप्युटर इंजीनियर भी अपनी अंगुली में तीन अंगुठियां पहन सकता है। हमारा युवा दोनों को साध सकता है। विज्ञान की तरफ जाना संस्कृति से विमुख होना नहीं है। हमारे इतिहास में प्रमाणिक तौर कई प्रतिमान ऐसे हैं जो दुनिया भर में पहली बार हुए। वैज्ञानिक भविष्य और अतीत में कोई विरोधाभास नहीं। पाइथागोरस, आर्यभट्ट, पाणिनी से लेकर बहुत कुछ ऐसा है, जो प्रमाणित हैं, इतिहास जिसका साक्षी है, उनके बारे में हमें जानना चाहिए।" वर्मा की पुस्तक में भारत के विशाल मध्यवर्ग के उपभोक्तावाद के प्रति आकर्षण से जुड़े सवाल पर उनका उत्तर था, "उपभोक्तावाद मध्यवर्ग का केवल एक लक्षण है। मेरा मानना है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, हमारे जीवन का एक हिस्सा रहा है। वात्सायन की पुस्तक में यह चार पुरुषार्थ शामिल हैं। अगर शुरू के तीनों पुरुषार्थ साध लिए जाएं, तो मोक्ष मिल जाएगा। भारतीय अपनी आध्यात्मिकता के साथ बहुत अच्छे ढंग से यथार्थवादी और भौतिकतावादी हैं। मेरी आलोचना यह थी कि मध्यवर्ग अपनी खुशहाली से इतना अभिभूत और सीमित हो गया कि उसे वंचित वर्ग का दुख दिखता ही नहीं। हम अघाये समुदाय, अपार्टमेंट में सिमट गए हैं।"

मध्यवर्ग से इस विकार को दूर करने के उपाय पर वर्मा का कहना था, "यह सच है कि मध्यवर्ग बहुत प्रभावशाली है, पर उसकी सोच बहुत सीमित है। वह हमेशा जादुई छड़ी की तलाश में रहती है। वह केवल यह देखता है कि हमारे हित में यह नेता क्या कर सकता है? वह बच्चों की उच्च शिक्षा, अपनी तनख्वाह, सस्ता पर्यटन, बचत, खरीद आदि से ही घिरा रहता है। मध्यवर्ग को अपनी शक्ति को पहचानकर उसका उपयोग देशहित में करना होगा। पर अभी तो मध्यवर्ग केवल सब्जबाग से खुश हो जाता है। आपको जानकर यह अचरज होगा कि मध्यवर्ग आपातकाल तक का समर्थक था। उसे लोकतंत्र से कोई मतलब नहीं था। वह गाड़ियों के समय से चलने भर से खुश था। गरीबों को संभालकर रखो। अपराधियों को बिना प्रक्रिया के भी जेल में रखो, काबू में रखो, बस। कोई आंदोलन इन्हें बदल नहीं सकता।" वर्मा ने दावा किया कि मध्यवर्ग की अपेक्षाएं कभी पूरी नहीं हो सकती। पर उसके पास विकल्प नहीं है। रही आंदोलन की बात तो मध्यवर्ग अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी के दायरे में इस तरह कैद है कि वह स्वतः कोई आंदोलन नहीं कर सकता। हां अगर कोई नेता सामने आए तो वह जरूर सुन सकता है।

श्रोताओं में से भवानीपुर कॉलेज में हिंदी की विभागाध्यक्ष डॉ वसुंधरा मिश्रा के इस सवाल कि अंग्रेजी के चलते हमारा युवा समाज, साहित्य और संस्कृति से दूर हो रहा है, इसके लिए क्या उपाय हो? वर्मा का उत्तर था, “शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन अनिवार्य है। पश्चिमी पाठ्यक्रम कई दशकों से लागू है। शिक्षा और संस्कृति सबसे पीछे हैं। हमे एक कमेटी बनानी चाहिए। अपनी सोच में उदारता लानी चाहिए।“ महाभारत, निष्काम कर्म और वेदांत का उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा, “ज्ञान का जाति और धर्म से कोई मतलब नहीं। अगर आप सुकरात, प्लेटो, अरस्तू को हमारी शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा बना सकते हैं, रोमन साम्राज्य ने ग्रीक को पराजित किया यह पढ़ाया जा सकता है, तो चाणक्य क्यों नहीं? चाणक्य की लिपी बीसवीं सदी तक खोजी नहीं जा सकी है। हमारी ऐतिहासिक स्मृति से चीजें हटा दी गईं, मुझे लगता है, इस पर प्रयास करना चाहिए। सरकार पर दबाव डालना चाहिए।“ ज्ञान, चिंतन और भारतीय संस्कृति से जुड़ी यह चर्चा और भी लंबी चलती पर समयाभाव के चलते इसे समाप्त करना पड़ा। विशंभर नेवर ने आभार व्यक्त किया। प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से आयोजित कलम कोलकाता के प्रायोजक थे श्री सीमेंट और मीडिया पार्टनर ताजा टीवी। अहसास कोलकाता की ओर से डोना गांगुली, इशा दत्ता, गौरी बसु, मलिका वर्मा और निलिशा अग्रवाल ने सक्रिय भूमिका निभायी।

Author quote: I greatly enjoyed it. It was a great pleasure talking to Bishambhar ji. Thank you very much.

Pictures

 

Media Coverage

Video