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Anu Singh Choudhary

23rd July 2020

मेरा लेखन सामंतवादी सोच के खिलाफः 'कलम अमृतसर' में अनु सिंह चौधरी

पंजाब के पवित्र शहर अमृतसर में 23 जून को शाम के चार बजे चटकीली धूप खिली थी। मौसम गर्म था, पर शब्दों से प्यार करने वाले इससे बेपरवाह थे। प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से ऑन लाइन आयोजित कलम अमृतसर में साहित्य प्रेमियों की गर्मजोशी उफान पर थी। आमंत्रित अतिथि थीं लेखिका अनु सिंह चौधरी। अहसास वूमेन ऑफ अमृतसर की जसमीत नैय्यर ने फाउंडेशन द्वारा 'अपनी भाषा, अपने लोग' अभियान के तहत आयोजित हो रहे कार्यक्रमों की चर्चा की और बताया कि चौधरी लेखिका, अनुवादक और फिल्म मेकर हैं। बीस से भी अधिक अंग्रेजी किताबों का हिंदी अनुवाद किया है। कई पुरस्कार प्राप्त डाक्यूमेंट्री और वेब सीरीज का लेखन और निर्देशन किया है। हाल ही में आयी वेब सीरीज आर्या की वह संयुक्त लेखिका हैं, जिसमें सुष्मिता सेन ने अभिनय किया है। आगे की वार्ता कैम्ब्रिज जूनियर स्कूल अमृतसर की प्राचार्या, नाट्यकर्मी रीना कुंद्रा ने किया।

कुंद्रा ने चौधरी से पहला सवाल उनकी लेखकीय यात्रा पर किया? चौधरी का जवाब था, “मैं खुशकिस्मत थी कि मुझे ऐसे मौके मिले, जहां मेरे काम, मेहनत व लेखन को पहचान मिली। प्रेरणा और सृजनात्मकता सिर्फ उन्हीं लोगों के पास टिकती है, जो मेहनत करता है। प्रयोगधर्मिता के बिना प्रतिभा का उपयोग नहीं हो सकता। हर कोई लिख नहीं सकता, हर कोई कलाकार नहीं हो सकता, हर कोई नाटक नहीं कर सकता। इसका सकारात्मक पहलू यही है कि आप कभी भी, और कहीं से भी अपनी यात्रा शुरू कर सकते हैं।"

मुंबई के अपने शुरुआती दिनों की चर्चा करते हुए चौधरी ने बताया, "उन दिनों मैं अपने एक दोस्त के यहां रुकी थी। फोन होते नहीं थे। इंटरनेट के लिए साइबर कैफे जाना होता था। ऐसे ही एक दिन जब मैं कैफे जा रही थी, तो बगल के दफ्तर में एक जाने-पहचाने चेहरे को जाते हुए देखा। मैंने देखा वह दीपक तिजोरी थे। मैं उनके पास गई और सीधे कहा कि सर मैं काम करना चाहती हूं। लिखना चाहती हूं। उन्होंने अपने सहयोगी से मुझे ऑफिस का पता दिलवाया और अगले ही दिन मैं वहां पहुंच गयी। मुझे काम मिल गया। इस तरह शुरुआत तो हो गई, पर ईमानदारी से कहूं तो आगे का सफर इतना आसान नहीं रहा। मेरे सहयोगी अच्छे थे।“ बॉलीवुड के माहौल पर चौधरी की टिप्पणी थी, “मैं अपने अनुभवों से कह सकती हूं कि यह ठीक है कि बॉलीवुड में पुरुषों का वर्चस्व है, पर मेरे पास कोई सनसनी फैलाने वाली कहानी नहीं है।"

"मैंने अखबार, टीवी से लेकर हर मीडियम के लिए लिखा है। आर्या की बात करूं तो उसे सभी ने देखा है, पर यह सुष्मिता सेन के चलते हुआ। हमने जो भी लिखा वह सुष्मिता सेन के लिए लिखा। मेरी लेखकीय पहचान पर मुझे संतोष है। हम इसी तरह अपने को व्यक्त कर पाते हैं। बतौर लेखक यह एक उपलब्धि है कि आपने किसी को हौसला दिया है, किसी को मनोरंजन दिया है, किसी को खुशी दी है, किसी को आपने प्रेरणा दी है। किसी को जानकारी दी।“ अपनी पुस्तक 'नीला स्कार्फ़' पर चौधरी का कहना था, "मैंने कविता से जोड़ने की कोशिश की। आखिर दुपट्टा क्या है? यह वह कपड़ा नहीं है, जिसकी हमें आवश्यकता है, बल्कि यह एक एक्ससरी है। पर फिर भी इसकी हमें जरूरत है। यह एक पहचान सरीखा है। मेरा पसंदीदा रंग नीला है, इसलिए मैंने उसे प्रतीक के रूप में चुना।" चौधरी का कहना था, “बिहार से दिल्ली में आकर रहनेवाली लड़कियों पर बहुत सारी किताबें आई थीं, पर यह सभी पुरुषों के नजरिए से लिखी गई थी। मैंने दिल्ली युनिवर्सिटी में छोटे शहरों से आई लड़कियों के नजरिए से लिखा। इसमें बहुत शोध करना पड़ा। अफसोस यह है कि बीस साल पहले की स्थितियां अब भी जस की तस हैं।“

'आर्या' पर चौधरी का कहना था, "इसमें बहुत मेहनत लगी। यह बहुत मुश्किल था। पर हमारी टीम बहुत अनुभवी और अच्छे लोगों की थी। मेरे को-राइटर बहुत अनुभवी लेखक हैं। मेरे निर्देशक भी बहुत अच्छे थे। यह एक उम्दा अनुभव था। एक फ्रेम में, टाइम में बंधकर लिखने का क्राफ्ट मैंने सीखा।" नीला स्कार्फ़ की सबसे अच्छी कहानी कौन सी है? पर उनका कहना था, “मेरी सारी कहानियां बहुत अच्छी हैं। पर मुक्ति और नीला स्कार्फ़ काफी अच्छी कहानियां हैं। अलगाव और संबंधों की कहानियां लिखना इतना आसान नहीं है। रिश्ते का अबोलापन बहुत खतरनाक है।” बिसेसर बो की प्रेमिका कहानी की चर्चा करते हुए चौधरी ने यह माना कि मेरी बेचैनी पितृसत्तात्मक सत्ता के खिलाफ है। जमींदार परिवार, सामंती व्यवस्था किस तरह औरतों के खिलाफ है, इसे ऐसे समझिए कि औरत या तो सजावट की चीज है या फिर फंक्शनल चीज है। एक सवाल के जवाब में चौधरी ने यह माना कि रचनात्मक लेखन और व्यावसायिक लेखन में बहुत अंतर है। रचनात्मक लेखन तन्हाइयों में होता है, उसकी कोई समय सीमा नहीं है, जबकि स्क्रीन राइटिंग काफी टेक्निकल काम है। एक क्राफ्ट है।

इस सवाल पर कि नई पीढ़ी को अगर इस क्षेत्र में आना है तो वह क्या करे? चौधरी का जवाब था कि उसे केवल पढ़ना होगा। सीखना होगा। इस क्षेत्र में प्रतियोगिता भी है, पर अवसर भी बहुत है। पर यह आपके अंदर से आना चाहिए। यह केवल पेशा नहीं है। निर्भया जैसे केस पर चौधरी का कहना था, “मैंने अपने बच्चों को एक पत्र लिखा था। वे उस समय बहुत छोटे थे। पर मेरी कोशिश थी कि वे एक औरत की मनःस्थिति को समझ सकें। जहां तक पटकथा लेखन की बात है, अगर आपके पास योग्यता है तो मौके हैं। पर इसके लिए आपके पास टिकने की क्षमता है।” अंत में चौधरी ने शेयर्ड नरेटिव यानी 'संवाद की साझीदारी' पर बल दिया और कहा कि लगातार ऐसे संवाद होते रहने चाहिए।

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