Dipti-Misra-2

Dipti Misra

1st August 2020

जिससे तुमने ख़ुद को देखा, हम वो एक नज़रिया थेः कलम न्यूयॉर्क में दीप्ति मिश्रा

अमेरिका में चुनावी गहमागहमी और कोरोना के असर के बीच हिंदी ग़ज़ल और कविता की यह अनूठी महफिल थी। प्रभा खेतान फाउंडेशन ने 'कलम न्यूयॉर्क' का आयोजन किया तो अमेरिका में सुबह के 11 बजे थे और भारत में रात के 8:30। 'झिलमिल अमेरिका' ने सहयोगी की भूमिका निभाई और अतिथि के रूप में हिंदी और उर्दू ग़ज़ल से जुड़ी कवयित्री, शायरा, कलाकार दीप्ति मिश्रा ने शिरकत की। स्वागत और संवादकर्ता अनूप भार्गव ने 'कलम' के प्रयासों की तारीफ करते हुए यह बताया कि प्रभा खेतान फाउंडेशन लेखकों और प्रशंसक पाठकों, श्रोताओं के बीच संपर्क स्थापित कराने का अनूठा प्रयास 'कलम' के माध्यम से कर रहा है। अमेरिका में कलम का यह तीसरा आयोजन है। उन्होंने कोरोना की चर्चा करते हुए कहा कि इसने जो अवसर उपलब्ध कराए हैं, वह है ऑनलाइन संवाद। इसी के चलते मुंबई में बैठी कवयित्री मिश्रा से मैं न्यूयॉर्क में बैठकर संवाद कर पा रहा हूं। उन्होंने मिश्रा का संक्षिप्त परिचय दिया। 'कलम न्यूयॉर्क' की यह खासियत रही कि यहां श्रोताओं ने संवाद के साथ-साथ शायरा मिश्रा से उनकी लोकप्रिय ग़ज़लें भी सुनीं।

भार्गव ने मिश्रा से पहला सवाल ही उनकी काव्य-यात्रा के बारे में पूछा, जिस पर मिश्रा का जवाब था, मुझे पता नहीं था कि लेखक बनूंगी। बचपन में मैं एक्ट्रेस बनना चाहती थी। फिर मुझे बताया गया कि यह बहुत अच्छा काम नहीं है, तो छोड़ दिया। मेरी बदलने की यात्रा लगातार जारी रही। मैं बाहरी गतिविधियों में बहुत सक्रिय रहती थी। साहित्य में रुचि थी। मैं अपने को व्यक्त करना चाहती थी। साहित्य में रुचि थी। मेरी मां और पिता से यह मुझ तक आया। साहित्य की पढ़ाई से यह तो होना है। डॉ कुंवर बेचैन के बारे में मिश्रा का कहना था कि उन्होंने उनको कॉलेज में पढ़ाया भी है। वह मेरी कविताओं नज़्मों को सुधारते भी थे। उन्होंने ही स्थानीय अखबार में मेरी कविता छपवाई भी थी। उन्होंने ग़ज़ल क्या होता है यह मुझे बताया भी। वह मेरे गुरु हैं। मैं उन्हें अपनी डायरी की कविताओं से शुरुआत हुई। मैंने पहली ग़ज़ल भी डॉ बेचैन को ही पढ़वाई थी। मुझे उन्होंने ग़ज़ल का मतलब बताया। काफ़िए बिठाना, तुकबंदी करना मुझे आ गया था। पर छंदबद्ध होना मुझे नहीं आया था। उसके बाद ग़ज़ल ने मुझे नहीं छोड़ा और ग़ज़ल ने मुझे नहीं छोड़ा।

मिश्रा ने श्रोताओं के अनुरोध पर अपनी यह चर्चित ग़ज़ल सुनाई, जिसके चंद शेर यों थे-

जिससे तुमने ख़ुद को देखा, हम वो एक नज़रिया थे, हम से ही अब क़तरा हो तुम, हम से ही तुम दरिया थे। जिससे हमने खुद को देखा, तुम वो एक नज़रिया थे, खुद को खोकर खुद को पाया, तुम तो केवल जरिया थे...

गुलाम अली की चर्चा होने पर मिश्रा ने उनसे जुड़े अपने अनुभव शेयर किए। मिश्रा ने बताया कि गुलाम अली की खासियत यह है कि वह जिस तरह से गाते हैं, उन्होंने एक-एक मिसरा गाकर पूछते थे, कि मोहतरमा यह कैसा गया। किसी लेखक के लिए यह बहुत बड़ी बात है। हरिहरन जी का अनुभव भी अनूठा था। उनका खुद से फोन आया कि आपकी ग़ज़ल 'है तो है' मैं गाना चाहता हूं। मैंने कहा गा लीजिए। उन्होंने कहा आप पूछेगी नहीं कि मैं कौन बोल रहा हूं, तब मैंने पूछा, तो उन्होंने बताया कि मैं हरिहरन हूं। उन्होंने जो सम्मान दिया वह बेहद अलग है। अतुकांत कविताओं का जिक्र होने पर मिश्रा ने अपनी लंबी कविता 'सुनहरी मछली' सुनाई, जिसके बोल थे-

बात है तो विचित्र किन्तु फिर भी है! हो गया था 'प्रेम' एक पुरुष को एक सुनहरी मछली से! लहरों से अठखेलियाँ करती, बलखाती, चमचमाती मछली भा गई थी पुरुष को! टकटकी बाँधे पहरों देखता रहता वह उस चंचला की अठखेलियाँ! मछली को भी अच्छा लगता था पुरुष का यूँ निहारना...

पुरुष, प्रकृति और प्रेम के पारस्परिक संबंध पर आधारित इस कविता के बाद संवादकर्ता भार्गव ने हिंदी कविता, उर्दू ग़ज़ल और मुकम्मल ग़ज़ल तक की मिश्रा से जुड़ी यात्रा सवाल पूछे। उन्होंने कविता की पाठशाला नामक अभियान का जिक्र भी किया। मिश्रा ने यह कहा कि यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत और साधना की है। मैं बस ग़ज़ल लिखती थीं। उर्दू वालों ने मुझे हाथोंहाथ लिया। उर्दू वालों ने ही मुझे कहा कि आप उर्दू की हैं। मैंने कहा हमारी ज़बान बस उर्दू है। मुझे उर्दू वालों से इतना प्यार मिला कि मैंने इसे सीखा। काफिया और रदीफ भी मेरी ग़ज़लों में है। मैंने अपनी खोज खुद की है। पहले मैंने खोज की है। उन्होंने श्रोताओं के अनुरोध पर एक बार फिर अपनी एक चर्चित ग़ज़ल सुनाई, जिसके चंद शेर यों थे-

वो नहीं मेरा मगर उससे मुहब्बत है तो है, ये अगर रस्मों, रिवाज़ों से बग़ावत है तो है, सच को मैंने सच कहा, जब कह दिया तो कह दिया, अब ज़माने की नज़र में ये हिमाकत है तो है...

सवाल-जवाब के सत्र में भारत में लेखकीय स्तर पर जुड़े सवाल पर मिश्रा ने कहा, मुझे भी आश्चर्य होता है कि लोग क्यों लिखते हैं। जहां तक मेरी बात है लेखन मेरी मजबूरी है। आज का लेखन डिमांड एंड सप्लाई का है। आजकल कोरोना ने उतना परेशान नहीं किया है, जितना कोरोना पर लिखने वालों ने परेशान किया है। मिश्रा ने यह भी कहा कि ऑन डिमांड लिखने की मेरी इच्छा नहीं है। अगर कोई मेरे नखरे स्वीकार कर ले तो मैं लिख देती हूं। मिश्रा ने स्पष्ट यह माना कि लेखन मेरा कारोबार नहीं है। यह मेरी साधना है। फिल्मों के लिए लिखना मेरी चाहत नहीं है। मिश्रा ने अपने पारिवारिक जीवन की चर्चा की और परिवार से मिले सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा, "अपनी सफलता का श्रेय मैं खुद को ही देती हूं। जो कुछ भी जीवन में हमने पाया है वह अपनी मेहनत से पाया है। खुद से सीखने से जो आत्मविश्वास आता है वह है। श्रोताओं की मांग पर उन्होंने अपनी एक और ग़ज़ल सुनाई, जिसका शुरुआती शेर था-

इनकार करूं, इकरार करूं ये इश्क कहां जा छोड़े है जब जी चाहे ये दिल जोड़े, जब जी चाहे दिन तोड़े है...

कार्यक्रम के आखिर में संवादकर्ता भार्गव ने प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा भारत से बाहर किए जा रहे कार्यक्रमों की सराहना करते हुए आभार प्रकट किया। उन्होंने झिलमिल अमेरिका द्वारा अमेरिका में रह रहे लोगों को भारतीय संस्कृति, कला व संगीत से जोड़ने की कोशिश का जिक्र किया। कलम न्यूयॉर्क में घनश्याम गुप्ता, सतीश मलिक, मानसी चटर्जी, अमिषा अनेजा आदि ने भी अपने सवाल पूछे। इस अवसर पर वाणी प्रकाशन और संदीप भूतोरिया जी का भी आभार अतिथि वक्ता मिश्रा व संवादकर्ता भार्गव ने किया।

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