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Himanshu Bajpai

29th August 2020

तहज़ीब बनने में कई पीढ़ियां लगती हैं: 'कलम रायपुर & बिलासपुर' में हिमांशु बाजपेयी

प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से 'कलम रायपुर & बिलासपुर' में दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने शिरकत की। अहसास वूमेन की ओर से गरिमा तिवारी ने 'कलम' और अतिथि लेखक का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि 'अपनी भाषा अपने लोग' वह सोच और विचार है, जिसके चलते 'कलम' संवाद सत्र की शुरुआत हुई। फाउंडेशन अपनी साहित्यिक गतिविधियों से महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में अथक प्रयास कर रहा है। नए माहौल में फाउंडेशन ने अपने सत्रों को वर्चुअल कर दिया है। अतिथि लेखक का परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि बाजपेयी ने किस्सागोई को पूरी तरह नया रूप दे दिया है। उन्होंने उर्दू कहानी कहने के पुराने अंदाज 'दास्तानगोई' को फिर से जिंदा कर दिया है। वह अपनी पुस्तक 'किस्सा किस्सा लखनउवा' के अलावा वेब श्रृंखला सेक्रेड गेम्स 2 में अपने कैमियो के लिए भी चर्चा में रहे हैं। तिवारी नेसंवादकर्ता नंदिता भास्कर का परिचय भी दिया।

भास्कर ने बाजपेयी से जनता के किस्से जनता के अंदाज में लिखने का जिक्र करते हुए उनसे लखनउआ शब्द के बारे में पूछा। बाजपेयी का कहना था, "लखनउआ शब्द में एक भदेसपन है, एक सहजता है। यह आम लोगों की जिंदगी किस तरह से इस शहर में गुजरती है, इसकी बात करता। इसमें चौक, चौराहे, चौपटिया, नख़ास, मौलवीगंज, पांडेयनगर आदि के किस्से मिलते हैं, पर जब हम लखनवी की बात करते हैं, तो उसमें नवाबी, ताल्लुकेदार, पैसेवालों और अमीरों के किस्से मिलते हैं।" किस्सों का इतना सजीव चित्रण कैसे कर लेते हैं? के सवाल पर बाजपेयी का जवाब था, "दो लोग मेरे गुरु हैं। एक से कभी नहीं मिला। पहले अमृत लाल नागर थे। दूसरे योगेश प्रवीण जी हैं। मैंने उन्हें ऐसे पढ़ा जैसे कोई मोहब्बतनामा लिखना है। शहर पर लिखना एक हसीन काम है, यह उन्हें पढ़ कर जाना।" गली और चौक के बारे में बाजपेयी ने कहा, "चौक इसलिए अहम हैं कि यहां पुरानी तहज़ीब बची हैं। यहां जाकर आपको लगता है कि यह जगह खास है। शायराना ज़बान, लखनवी तहजीब, कौमी एकता, रंगारंगीन शाम, लखनऊ का सारा हुस्न इस जगह पर इकट्ठा है।"

बाजपेयी ने किस्सा किस्सा लखनउआ की चर्चा करते हुए कहा, "ज़बान पर वहां काफी काम हुआ। वहां टोकने को बुरा नहीं माना जाता, बल्कि माना जाता है कि हमने अपने इल्म में इजाफ़ा किया।" उन्होंने अमीनाबाद से जुड़ा एक नवाब साहब और फूल वाली का किस्सा सुनाया। आपने शायर बनने की क्यों नहीं सोचा? पर बाजपेयी का जवाब था, "शायरी के लिए अलग तरह का हुनर चाहिए। शायरी करना एक अहम चीज है। हम उन्हें समझ लेते है, यही बड़ी बात है।“ आप दास्तानगोई में काकोरी कांड का कैसे इतना सजीव चित्रण कर लेते हैं? बाजपेयी का जवाब था, "कहानी हम वही सुनाते हैं, जिस पर हमारा अकीदा है। जिस पर हमें यकीन नहीं है, उसे हम नहीं सुनाते। हम मज़ाज़ की दास्तान अंकित चड्ढा के साथ सुनाते थे। हम फैज़ अहमद फैज़ की दास्तान नहीं सुनाते थे, जबकि वह मजाज से बहुत बड़े शायर थे।" बाजपेयी ने यह माना कि किस्सागोई सिखाना एक जिम्मेदारी है। रायपुर पर किस्सा सुनाने के अनुरोध पर उन्होंने कहा कि अगर कोई रायपुर वाला वहां की कहानी सुनाए तो बेहतर होगा।

एक सवाल के जवाब में बाजपेयी ने कहा, "तहज़ीब बनने में कई पीढ़ियां लगती हैं। जिस लखनऊ को हम अपने तस्सवुर में रखते हैं उसे बनने में समय लगा। मज़ाज़ ने लिखा था, 'मिटते हुए को देख के क्यों रो न दें मज़ाज़, आख़िर किसी के हम भी मिटाये हुये तो हैं।' अमीर मिनाई का शेर है, 'खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम अमीर, सारे जहां का दर्द हमारे ज़िगर में है।' लखनऊ में आप गोलगप्पे खाने जाएं, तो उसे भी खाने-खिलाने का एक सलीका है।" बाजपेयी ने कॉलेज का अनुभव, जवानी के दिनों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि जवान आदमी भी बूढ़ा हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि पुरानापन ही नएपन को सुनने में मदद करता है। नई पीढ़ी से जुड़े सवाल पर उन्होंने माना कि फिजां बदल गई है। पर इसके लिए पुराने लोग जिम्मेदार हैं। पुरानी पीढ़ी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। उन्होंने न्यूज चैनलों का उदाहरण दिया। अनीस जी के कहानी सुनाने के अनुरोध पर बाजपेयी ने कहा कि मेरी कहानियां काफी लंबी हैं। दो घंटे से अधिक की कहानियां हैं।

आगे का संवाद गौरव गिरिजा शुक्ला ने किया। नौकरी छोड़कर दास्तानगोई का झंडाबरदार बनने में परिवार का कितना सहयोग मिला? के सवाल पर बाजपेयी ने इस शेर 'जिसको खुद अपनी खबर नहीं रहती, उसको सालारे कारवां न बनाएं' का जिक्र करते हुए बताया, "जब मैंने नौकरी छोड़ी कि दास्तानगोई करूंगा, तो घर वालों का मुझ पर भरोसा था कि यह कर लेगा। दूसरा वे मानते थे कि इसका जो मन होगा, तो करता ही है। कामयाबी मिल गयी और पैसा आने लगा तो थोड़ा निश्चिंतता हो गयी। मां से सपोर्ट मिला।" कंटेंट से जुड़े सवाल पर बाजपेयी ने कहा, "हर व्यक्ति कि अपनी एक यात्रा है। रामदरश मिश्र की कविता है, 'जहां आप पहुंचे छलांगे लगाकर वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे धीरे' यह जमाना अधिक डेमोक्रेटिक है। यहां बताने वाले लोग हैं। हमारे समय में नॉलेज के उतने स्रोत नहीं थे। तब साइबर कैफे ही था। पर आज तो गूगल पर पानी कैसे उबालें की सीख भी मिलती है। सोशल मीडिया के होने से आपको इंतजार नहीं करना है। पर हर दौर की कुछ खामियां, खूबियां हैं। हमने काकोरी कांड की दास्तान ढाई साल में लिखी। हर चीज में वक्त लगता है। 'धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।'"

ऋचा मित्रा ने किस्सागोई से जुड़ा सवाल पूछा। बाजपेयी का जवाब था, "दास्तानगोई क्या है इसे लोगों को समझाने में बहुत समय लगा। थिएटर, फिल्म, आर्ट अब भी एक प्रोफेशन नहीं बन पाया। यह चिंता एक वास्तविक चिंता है, कि क्या आने वाले बीस साल तक इसके साथ ऐसे ही बढ़ा जा सकता है। पर एक विश्वास है, जिसके भरोसे से हम आगे बढ़े।" अंजली सिंह ने पूछा प्रोफेशन छोड़ने में रिस्क नहीं लगा? बाजपेयी का जवाब था, "पत्रकारिता में रहना ज्यादा रिस्की है। वहां के हालात बहुत अच्छे नहीं थे। वहां एवरेज लोगों की हुकूमत है। अंदर से संतुष्टि नहीं मिली, जबकि जर्नलिज्म मेरी पहला प्यार था।" डॉ जवाहर ने भी सवाल पूछा।

शुक्ला ने सभी का आभार प्रकट किया। 'कलम बिलासपुर & रायपुर' के प्रायोजक थे श्री सीमेंट। सहयोगी थे अभिकल्प फाउंडेशन। हॉस्पिटैलिटी पार्टनर हयात रायपुर और मीडिया पार्टनर के रूप में दैनिक जागरण की ओर से नई दुनिया की भूमिका थी।

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