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Chitra Mudgal

25th August 2020

युवा लेखकों के सामने नए मनुष्य गढ़ने की चुनौतीः 'कलम अमृतसर & जालंधर' में चित्रा मुद्गल

प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से आयोजित 'कलम अमृतसर & जालंधर' में लेखिका चित्रा मुद्गल ने शिरकत की। अहसास वूमेन जालंधर की ओर से रुही वालिया स्याल ने किया स्वागत किया। 'कलम' आयोजन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि फाउंडेशन का मानना है कि भाषा की अपनी कोई सीमा या मापदंड नहीं है। भाषा जिंदगियों को एक साथ जोड़ती है और बुद्धि को समृद्ध करती है। 'अपनी भाषा अपने लोग' वह मंत्र जिसके इर्दगिर्द 'कलम' के आयोजन होते हैं, और इसका उद्देश्य हिंदी साहित्य और उसके लेखकों को पाठकों से संवाद के लिए एक खास तरह का मंच मुहैया कराना है। अतिथि लेखिका की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि मुद्गल अपने उपन्यास 'पोस्ट बॉक्स न. 203 नाला सोपारा'’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित की गईं तो 'आंवा' के लिए उन्हें व्यास सम्मान मिला। वह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के अंतरिक्ष एवं अणु उर्जा विभाग की संयुक्त हिंदी सलाहकार समिति का हिस्सा भी रही हैं। भारतीय भाषा परिषद कोलकाता के 'कृतित्व समग्र पुरस्कार' और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया मुंबई के राज भाषा विभाग द्वारा हिंदी साहित्य के लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित हैं। मुद्गल से आगे की बातचीत के लिए उन्होंने लेखिका और कवयित्री अणु शक्ति सिंह को आमंत्रित किया।

सिंह ने की मुद्गल से पहला सवाल उनके बचपन व विजातीय विवाह को लेकर पूछा। मुद्गल ने बताया कि उनके पिता नौसेना में अधिकारी थे। उनका स्थानांतरण होता रहता था। चेन्नई में पैदा हुई। पिताजी विदेश चले गए तो कुछ शुरुआती साल गांव में भी रही। फिर मुंबई में रही। क्षत्रीय खानदान की लड़कियों को पढ़ाकर शादी ही कराना है, ऐसी सोच, समृद्ध परिवार और ऐश्वर्य से अलग जाकर मैं ट्रेड युनियन के दफ्तर में बैठने लगी। मुद्गल का कहना था, "लिखने की प्रेरणा मुझे प्रतियोगिता में शामिल होने के उद्देश्य से मिली। मैंने लिखना कक्षा सात में शुरू किया। स्कूल की पत्रिका में कहानी छपी तो मेरी मां बहुत खुश हुई। बाद में असंगठित क्षेत्र की घरेलू कामकाजी महिलाओं की लड़ाई के लिए जागरण नामक संस्था से जुड़ी। कॉलेज में आने के बाद ट्रेड युनियन से उस जीवन को देखने के लिए जुड़ी, जिसे मैंने प्रेमचंद के गोदान, ताराशंकर बंदोपाध्याय के गणदेवता और निकोस के जोरबा द ग्रीक को पढ़कर जाना था।" पत्रकार, संपादक अवध नारायण मुद्गल से अपनी शादी को उन्होंने वर्ग भेद और वर्ण भेद के प्रति अपना विद्रोह बताया। शादी करके हम एक झोपड़पट्टी में रहे। इसके पीछे मजदूरों के बीच में रह कर उनकी जिंदगी को देखने की हमारी सोच थी। मेरा पहला बच्चा मजदूरों के बीच ही पैदा हुआ। उस दुनिया की विषमता को बिना देखे मैं समझ नहीं सकती थी।

एक सवाल के जवाब में मुद्गल ने बताया, फिल्म 'बधाई हो'’ 1976 में प्रकाशित उनकी कहानी 'दुलहिन' से चुरा कर बनाई गई। 'थ्री इडियट्स' में चेतन भगत के साथ भी ऐसा हुआ। लेखक कहानियों की चोरी के विवाद में नहीं फंसता। हमारा हिंदी समाज अपनी अस्मिता की लड़ाई में बहुत बंटा हुआ है।“ आज के लेखकों क्या लिखना चाहिए? के जवाब में मुद्गल ने कहा, "आज के लेखकों के सामने आदर्श नहीं हैं। साहित्य जन का इतिहास है। 'जन' चाहे जिस वर्ग का हो, उसकी लड़ाई लड़ना साहित्य का काम है। पर तकनीक ने विश्व को एक गांव बना दिया है। नई पीढ़ी के लेखक को पुराने संक्रमण के साथ उदारवाद की चुनौतियों से जूझना है। उपभोक्तावाद और बाजारवाद ने परिवार, कुटुंब जीवन और सामाजिक तानेबाने को तोड़ दिया है। अनाथ-आश्रम और वृद्धाश्रम हमारे यहां नहीं थे। इसी तरह आत्मनिर्भरता और शिक्षा के बावजूद आधुनिकता ने लड़कियों के लिए अलग तरह की समस्याएं पैदा की हैं। समाज का दृष्टिकोण बदले बिना लड़कियों को न्याय नहीं मिलेगा। पर लड़के-लड़कियों की समानता के बावजूद युवा लेखिकाओं को बहुत से नए तरह के मनुष्य को गढ़ने की जरूरत है।"

मुद्गल ने युवा लेखक, लेखिकाओं का जिक्र करते हुए कहा, “यह अच्छी बात है कि आज की नई पीढ़ी नए संक्रमणों के बावजूद नया साहित्य लिख रही है। मेरा मानना है कि साहित्य से काफी असर पड़ता है। मजदूरों के पलायन पर उन्होंने अरुण प्रकाश की कहानी भईया एक्सप्रेस के साथ ही कई रचनाओं का जिक्र किया और भरोसा जताया कि नया वक्त आ रहा है, आएगा। नई पीढ़ी भारत की स्त्री होने की अस्मिता को कायम रखते हुए लगातार लिख रही है।“ मुद्गल ने सलाह दी कि लड़कियों को बंद होकर नहीं रहना चाहिए। अपने उपन्यास 'आंवा' से जुड़े एक सवाल के जवाब में मुद्गल ने बताया, "मेरा उपन्यास 'आंवा' दत्ता सामंत पर नहीं शंकर गुहा नियोगी की हत्या के बाद लिखा गया। मैं नियोगी की हत्या को मजदूरों के अधिकारों, मांग और मार्गदर्शक की हत्या मानती थी। मैंने इसीलिए मुंबई औद्योगिक नगरी को आधार बनाया, जहां देश भर से मजदूर आते हैं। इसीलिए मैंने मजदूरों के बारे में, उनके जीवन के बारे में, उनके नेताओं और आंदोलनों में जो अंतर्विरोध है, उसकी बुनियाद पर लिखा। मजदूरों में विभेद, जातिवाद, जासूसी, बिल्डर लॉबी, शिवसेना, दलितों का जो उभार, बिकाऊ मजदूर नेता आदि पर अपने अनुभव से लिखा। दत्ता सामंत हमारे नेता थे। उनसे बहुत कुछ सीखा था। हड़ताल और तालाबंदी के बाद जब मजदूरों के चूल्हे नहीं जलते थे, पर उन्हीं को न्याय दिलाने के नाम पर जो श्रमिक नेता संसद पहुंचे, वहां जाकर चुप रह गए। भ्रष्टाचार और उनके बीच के अनुभव ने मुझे प्रेरित किया। लॉकडाउन में गांव पहुंचने के बाद भी उस मजदूर के पास कोई विकल्प नहीं था। यह समय का 'आंवा' था। आज अंग्रेजी समाज से ज्यादा भ्रष्टाचार है, पर मुझे विश्वास है कि यह वक्त बदलेगा।"

मुद्गल ने अपने उपन्यास 'गिलिगडु' के लिखने के पीछे वृद्धाश्रम से जुड़े अपने अनुभव का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे चंडीगढ़ के एक समृद्ध वृद्ध व्यक्ति के बेटे ने उन्हें वृद्धाश्रम में लाकर छोड़ दिया। उसी घर से बाहर निकाल दिया जिसे उन्होंने बनाया था। पर आखिरी वक्त में वह उसी बेटे को याद कर रहे थे। युवा पीढ़ी को यह याद रखना चाहिए कि कल उसके सामने भी ऐसा वक्त आ सकता है। क्या उसे यह पता था कि कोरोना होगा। 'सुनगुनिया'’ भी ऐसी ही कहानी थी। दिलीप सिंह राजपूत, सुदेष्णा चक्रवर्ती, अजय शर्मा ने अपने सवाल पूछे। अहसास वूमेन जालंधर की शीतल खन्ना ने आभार ज्ञापित किया। 'कलम अमृतसर & जालंधर' के प्रायोजक श्री सीमेंट थे। हॉस्पिटैलिटी पार्टनर ताज स्वर्ण और मीडिया पार्टनर दैनिक जागरण थे। अहसास वूमेन अमृतसर & जालंधर की ओर से जसमीत नैय्यर, प्रणीत बब्बर, प्रीति गिल, रमनजीत ग्रोवर और सोनाक्षी कुंद्रा ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

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