Himanshu-Bajpai

Himanshu Bajpai

14th September 2020

लखनऊ मेरे लिए सुकून की पनाहगाह हैः हिमांशु बाजपेयी

कलम जोधपुर में अतिथि वक्ता थे लेखक, किस्सागो हिमांशु बाजपेयी। अहसास वूमेन की ओर से सुषमा नीरज सेठिया ने उनका स्वागत किया और परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि बाजपेयी लखनऊ में पैदा हुए और वहीं पले-बढ़े। लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बनाकर लखनवी तहजीब, लखनवी अवाम और संस्कृति के तानेबाने बुनते हुए दास्तानगो बन गए। बाजपेयी ने किस्सागोई को नया रूप दे कर कहानी कहने के पुराने अंदाज 'दास्तानगोई' को फिर से जिंदा कर दिया है। सेठिया ने इसके बाद संवादकर्ता फ़ानी जोधपुरी का भी परिचय दिया और बताया कि वह एक मशहूर, शायर और कवि तो हैं ही आकाशवाणी में उद्घोषक भी हैं। आपके कई गज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।

जोधपुरी ने बाजपेयी से पहला सवाल पूछा, दास्तानगोई क्या है? जवाब मिला, "यह भारीभरकम शब्द जरूर है, पर अगर हम कहें कि यह कहानी सुनाना है, तो सभी लोग इससे वाकिफ होंगे। यह कहानी सुनाने का ही फ़न है, पर इसके कुछ वसूल हैं, रवायत है, आदाब है, कुछ नियम है, शास्त्रीयता है। उर्दू में कहानी सुनाने की एक परंपरा है। दास्तान यानी कहानी, गोई मतलब कहना।" दास्तानगोई कहां पैदा हुई और भारत में कैसे आई? के सवाल पर बाजपेयी ने कहा, "माना जाता है यह ईरान में पैदा हुई और वहां से भारत आई। खासतौर से खुसरो ने चार दरवेश, बागो बहार सुनाया। हज़रत निजामुद्दीन औलिया साहब जब बीमार हुए तो खुसरो ने यह कहानी सुनाई।" इसके बाद बाजपेयी ने मुगल दरबार और लखनऊ में दास्तानगोई के पहुंचने, मीर अमन देहलवी ने किस्सा चार दरवेश का अनुवाद, अकबर के दास्तानगोई से प्रेम और नवलकिशोर प्रेस की भूमिका की भी विस्तार से चर्चा की। दास्तानगोई की विशेषता से जुड़े सवाल पर बाजपेयी ने बताया, "रिवायती दास्तानगोई के चार बुनियादी अवयव होते हैं। एक रज्म, बज़्म, तिलिस्म, ऐयार... दास्तानगोई का खास अंग है माहौल, इसकी फ़िजा। इसकी शुरुआत साकीनामा से इसलिए होती है कि एक खास तरह का माहौल भी तारी हो।" इसके बाद उन्होंने मुहम्मद हुसैन जाह का 19वीं सदी में लिखा साकीनामा 'नाजो के उठाने वाले साकी' भी सुनाया।

यह पूछे जाने पर कि क्या दास्तानगोई की रिवायत में भी कोई बदलाव हुआ है? बाजपेयी ने कहा, "रिवायती दास्तानगोई 1928 मीर बाकर अली देहलवी की मौत के बाद खत्म हो गई। 2005 में इस फ़न को महमूद फ़ारूक़ी द्वारा दोबारा जिंदा करने की कोशिश हुई। इसके बाद आधुनिक दास्तानगोई में समकालीन विषय को उठाया जाने लगा, जिसमें नई बातें भी जुड़ीं। भारतीय दास्तानों के साथ ही इसमें नई कहानियों को जोड़ा जा रहा है। इसमें अवधी रंग भी मिलता है।" बाजपेयी ने काकोरी कांड, महात्मा गांधी, आम, कबीर, खुसरो पर अपनी दास्तानगोई की चर्चा की। बाजपेयी ने यह दावा भी किया कि यह विधा साझी संस्कृति, प्रगतिशील विचार और क्लासिक लिटरेचर को बढ़ावा देती है। दास्तानगोई में ज़बान की शुद्धता कितनी अहम है? के जवाब में बाजपेयी ने स्पष्ट किया, "यहां ज़बान का ही हुस्न है, इसमें हिंदी और उर्दू विवाद को लाना ठीक नहीं। दास्तानगोई में शुद्धता का आग्रह वाक्य विन्यास तक ठीक है, पर उच्चारण में इसे लाना ठीक नहीं है।"

दास्तानगोई और किस्सागोई से जुड़े सवाल पर बाजपेयी ने कहा, "इसमें कोई अधिक फर्क नहीं। बस अंतर इतना है कि दास्तानगोई का एक शास्त्र है, यह एक विधा बन गई है। जबकि किस्सागोई में कोई बंधा फ्रेम नहीं है।" बाजपेयी के लिए लखनऊ कितना जरूरी है? के जवाब में उन्होंने कहा, "लखनऊ मेरे लिए मां का आंचल सा है। शहर से जब आपका कनेक्शन जुड़ जाता है, तब आप उसे महसूस कर रहे होते हैं। मेरे लिए लखनऊ सुकून की पनाहगाह है, जो अंदर महसूस होती रहती है।" बाजपेयी ने यह माना कि दास्तानगोई में उनके पास जो भी अच्छा है, वह सब अंकित चड्ढा का है और जो सीमा है वह उनकी खुद की है। अंकित उनसे पहले से फुल टाइम दास्तान कर रहे थे और हर चीज में आगे थे। पैसे से जुड़े एक सवाल पर बाजपेयी की प्रतिक्रिया थी, "हर आर्ट फार्म को ग्लैमर चाहिए। हम कलाकारों की अजमत नहीं समझते। उनको अहमियत नहीं देते। अगर कलाकार ही नहीं बचा तो कला भी नहीं बचेगी।

पुराने जमाने में उनके संरक्षक होते थे। कलाकारों के पास पैसा नहीं होगा तो करेंगे क्या?"

गुटबंदी के सवाल पर बाजपेयी ने कहा कि जहां सामाजिकता होगी वहां गुटबंदी होगी ही। यह इंसान की अपनी दिक्कत है। पारिवारिक सहयोग पर उन्होंने कहा कि असली चीज है आपके अंदर का बल, जो आपको धकेलता है। इस संवाद दौरान बाजपेयी ने माना, "मैं महमूद फारूकी जैसा नहीं। कला और इतिहास की जो समझ फारूकी को है वह अलग है। मुझमें ऐसी गहराई नहीं। दास्तानगोई को लेकर मैंने कोशिश की है सिर्फ। हम अच्छी दास्तान सुना पाएं या नहीं। पर हमें यह सलीका है। गालिब को सुनने और पसंद करने का मतलब यह नहीं कि हम ऐसा कर सकते हैं।" उर्दू-हिंदी के सवाल पर उन्होंने कहा, "भगत सिंह को देश के लिए मु्हब्बत दिखानी थी, तो उन्होंने 'इंकलाब-जिंदाबाद' कहा, पर बंटवारे के बाद उर्दू को पाकिस्तानी करार दिया जाना गलत है। जो ऐसा करते हैं, वह तवारीख से नहीं वाक़िफ़ हैं। हम सब जो हिंदी बोलते हैं, उसमें उर्दू शामिल है। हिंदी-उर्दू में केवल लिपी का फर्क है। आमतौर पर ज़बान एक ही है।" उन्होंने यह स्वीकारा कि वह किताब पर काम करना चाहते हैं। इसी एक सवाल पर उन्होंने कहा, "दास्तानगोई किताब पढ़ना नहीं सिखा सकती। जिस तरह सुनने का विकल्प पढ़ना नहीं हो सकता उस तरह पढ़ने का विकल्प सुनना नहीं हो सकता।" युवाओं से जुड़े सवाल पर बाजपेयी का मत था, "जल्दी ऊंचाई पाने के चक्कर में युवा भटक जाते हैं। हर इंसान की अपनी यात्रा है। हम अंदर से कितना शांत हैं। हमने खुद को कितना समझा है, आगे की राह इस पर तय होती है।"

कलम जोधपुर के प्रायोजक हैं श्री सीमेंट। ताज हरिमहल और अहसास वूमेन जोधपुर ने सहयोगी की भूमिका अदा की

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