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Pratyaksha

12th September 2020

आज की कसौटी पर अतीत को कसना गलतः प्रत्यक्षा

लेखिका प्रत्यक्षा का कलम पटना & रांची में स्वागत करते हुए अहसास वूमेन की पूनम आनंद ने लेखिका का स्वागत करते हुए बताया कि प्रत्यक्षा हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में लिखती हैं, सोचती हैं, गुनती हैं। पावरग्रिड के वित्त विभाग से जुड़ी हैं। संगीत और लिबरल आर्ट में रूचि रखती हैं; इतिहास और समय के रहस्य में मनुष्य़ के अस्तित्व का सन्दर्भ खोजती हैं। इनके लेखन में समय और मानव संबंधों की बारीक संवेदना दर्ज है। जंगल का जादू तिल तिल, पहर दोपहर ठुमरी, एक दिन मराकेश, तुम मिलो दोबारा, तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है और बारिशगर जैसी पुस्तकों के साथ ही ब्लॉग और सोशल मीडिया पर भी अपनी भावनाओं को उजागर करती हैं।

रश्मि शर्मा ने संवाद को आगे बढ़ाते हुए पूछा कि सृजन की विधाओं में उन्हें क्या पसंद है? प्रत्यक्षा का जवाब था, "घर व कार्यालय के काम के बीच लिखना और पेंटिंग दोनों ही कर लेती हूं। पर सबसे ज्यादा आनंद लिखने में आता है। पेंटिंग मैं करती हूं, पर मैं लेखन में ही अपने को अभिव्यक्त कर पाती हूं। लिखने की शुरुआत कहानी से किया और जब ब्लॉग लेखन शुरू हुआ तो कविता लिखने का दौर भी आया। लिखना भी एक रियाज़ जैसा है। जितना आप लिखते जाते हैं उतना ही आप मंजते हुए चले जाते हैं।" अच्छी भाषा से जुड़े सवाल पर उनका कहना था, "भाषा तो एक माध्यम भर है। पर उसके पीछे एक तथ्य भी है। मैं भीतर के भावों, भीतर की दुनिया की जटिलताओं को पकड़ कर अंदर और बाहर की आवाजाही को व्यक्त करती हूं। मैं मानती हूं कि पाठक बहुत प्रबुद्ध है, वह उसे समझ लेगा।" आंचलिकता से कथा साहित्य के संबंध पर प्रत्यक्षा ने कहा, "रांची मेरा अपना शहर है। दिल्ली आकर हम सोचने लगते हैं कि हम अलग न दिखें। इस चक्कर में अपनापन छूटने लगता है। जब मैंने लिखना शुरू किया तो जो चीजें मुझसे छूट रही थी, उन शब्दों को मैं पकड़ पाई। दूसरी भाषा के लेखकों के साथ भी यह बात है। स्थानीयता में एक संगीत है।" इस संवाद के दौरान प्रत्यक्षा ने रांची से जुड़ी अपनी कई यादें भी शेयर कीं। उन्होंने कहा बचपन बहुत प्यारा होता है।

आपकी किताबों के नाम इतने अलग क्यों हैं? इस सवाल पर प्रत्यक्षा ने कहा, "किरदारों का नाम मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्हें रचते हुए मुझे उनके नाम याद आ जाते हैं।" तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, "यात्रा और इतिहास में मुझे बहुत मजा आता है। जब कोई यंत्र नहीं था, तब भी वह यात्रा में निकल जाते थे। दुनिया को देखने और खोजने का उनमें कितना ज़ज़्बा था। यात्राओं में मैं कला, संस्कृति, खान-पान, भाषा पर बहुत ध्यान देती हूं। उनमें कितनी समानता है, उन्हें जानना मुझे बड़ा मजेदार लगता है। मैं इस बात के लिए आतुर रहती हूं कि कैसे सारी चीजें जान लूं।" एक सवाल पर प्रत्यक्षा का कहना था, 'फेसबुक ने तमाम तरह की चीजें सामने ला दी हैं। स्टीरियो टाइप बातें हैं। पर मुझे लगता है, अगर आप अपने घर के स्तर पर अपने को सम्मान दिलवा लें, फिर भी समाज बदल सकता है। मेरा मानना है कि स्त्री खेत में, काम पर, घर पर, अपना मान करा पा रही है।" लेखन में स्त्री लेखन, दलित लेखन जैसे विचार पर प्रत्यक्षा का कहना था कि आज के दौर में हालात बदल चुके हैं। अगर आप बाहर निकल जाते हैं और हालातों को हैंडल करना सीख लेते हैं, तो फिर कोई दिक्कत नहीं होती। कार्यालय और लेखन के बीच दिक्कत संबंधी सवाल पर प्रत्यक्षा ने कहा कि मुझे कार्यालय की दुनिया और लेखन को साधने में कोई दिक्कत नहीं होती है।

कोरोना काल को साइंस फिक्शन जैसा बताते हुए उन्होंने कहा कि इसने हमारे जीवन की रूटीन को बदल दिया। पहले तो हमें समझ नहीं आया। फिर घर के हालातों से तालमेल में उलझ गए। फिर मजदूरों के विस्थापन ने हिला दिया। मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया। अभी भी हालात बदले नहीं हैं। शायद जीवन में एक पॉज आ गया है। अपनी पुस्तक ग्लोब के बाहर एक लड़की की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा यह एक प्रयोगात्मक किताब है। यह न कविता, न कहानी, न कथा, न डायरी है। यह मन के अरमान हैं।

मंगला रानी के सवाल कि चिंतन पर शहर कितना प्रभाव डालता है? प्रत्यक्षा ने कहा, "इनका बहुत असर होता है। शहर के मिज़ाज में बहुत अंतर होता है। परिवेश और वातावरण का प्रभाव होता है।" प्रमोद कुमार के इस सवाल पर कि आपके लेखन की भाषा क्या है? प्रत्यक्षा ने कहा, "जाहिर है हिंदी।" महिमा श्री ने पूछा 'बारिशगर' में तैमूर लंग को क्रूर की जगह इतना संवेदनशील बताने की सोच कैसे आई? प्रत्यक्षा ने कहा, "हम ऐतिहासिक पात्रों के समय में जाकर उन्हें नहीं देखते। हम आज की कसौटी पर उन्हें कसते हैं।" अन्विता का सवाल था, आप लेखन और नौकरी दोनों कैसे कर लेती हैं? प्रत्यक्षा का जवाब था, "फूल टाइम लिखने से पैसा नहीं मिलता। फिर कई बार सोचती हूं, शायद व्यक्ति व्यस्त रहने से अच्छा कर लेता है। बहुत खाली रहने से आप बहुत कुछ नहीं कर सकते। अब एक फक्कड़पन जीवन में आ गया है। आप अपने पैशन को अगर एंज्वॉय नहीं कर सकते, तो लिखने की क्या आवश्यकता है।" अहसास वूमेन की पूनम आनंद व सीमा सिंह की भूमिका उल्लेखनीय है।

कलम पटना के प्रायोजक हैं श्री सीमेंट। नवरस स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स और दैनिक जागरण ने सहयोगी की भूमिका अदा की

कलम रांची के प्रायोजक हैं श्री सीमेंट। दैनिक जागरण और अहसास वूमेन रांची ने सहयोगी की भूमिका अदा की

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