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Asghar Wajahat

15th October 2020

भाषा के प्रति हमारा दृष्टिकोण उदार होः असग़र वजाहत

"भाषा एक बहता हुआ पानी है। भाषा न कभी रुकी है, न रुकेगी। भाषा की शुद्धता की बात ही गलत है। इस संसार में कुछ भी शुद्ध नहीं है।" वरिष्ठ लेखक असग़र वजाहत ने यह बात 'कलम फरीदाबाद & मेरठ' के ऑनलाइन सत्र में कही। यहां उनका स्वागत अहसास वूमेन की ओर से गरिमा मित्तल ने किया। उन्होंने कलम के आयोजन के पीछे की सोच और कोरोना काल में भी इसके जारी रहने की चर्चा करते हुए वजाहत का विस्तार से परिचय दिया और आगे के संवाद के लिए अहसास वूमेन एनसीआर की आराधना प्रधान को आमंत्रित किया।

प्रधान ने और कहा कि आपका लेखन एक विशाल इंद्रधनुष की तरह है और आप अध्यापन भी करते रहे। आपने शिक्षण पहले शुरू किया या लेखन? वजाहत का उत्तर था, "मैं जब छात्र था तभी से लिखना शुरू किया। 1964-65 के दौरान बी.एससी. करने के दौरान ही लिखना शुरू कर दिया था।" प्रधान ने अगला सवाल जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्या ई नईं पर किया कि इसके प्रकाशन के तीस साल हो गए. यथार्थ के धरातल पर आप इसे कहां पाते हैं? वजाहत का जवाब था, "यह इसलिए भी खास है कि जब इसका पहला मंचन हुआ, तब भी लोगों ने कहा था कि आपने विभाजन नहीं देखा, पंजाब में पैदा नहीं हुए, फिर भी आपने उस दर्द का बयान कर दिल को छू लिया। आज भी लोग यही कहते हैं। मानव संबंध से बड़ी कोई चीज नहीं। इस नाटक में इंसानियत का जो नाता है वह है। यह नाटक जब सिडनी में खेला जा रहा था, तो एक महिला दर्शक इस नाटक को देखकर इस कदर रोईं कि उनकी आंख का ऑपरेशन टल गया। इस नाटक ने लोगों की भावनाओं को छुआ।"

क्या आज की जेनेरेशन भी विभाजन के दर्द को महसूस करती है? पर वजाहत का जवाब था, "यह नाटक विभाजन के बाद का है। वैसे भी इसकी नाटकीयता- मानव संबंध और भावनाओं, एक दूसरे के प्रति बनते बिगड़ते रिश्तों पर है। विभाजन इस नाटक की पृष्ठभूमि में है।" सोशल मीडिया से शिक्षक छात्र, पाठक लेखक की दूरी कम हो गई है। पहले का चुंबकीय आकर्षण खत्म हो गया है? क्या आप इसे महसूस करते हैं? वजाहत का उत्तर था, "बदलाव एक प्रक्रिया है। बदलाव की एक सार्थकता इसका समय और तकनीक के साथ होना भी है। हमें इस बदलाव के साथ होना चाहिए।" आप बुडापेस्ट में हिंदी के अध्यापक रहे। वहां के छात्रों में और भारतीय छात्रों में क्या अंतर देखा? वजाहत का उत्तर था, "विदेश के हिंदी छात्र अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए सीखते हैं। उनका उद्देश्य नौकरी पाना, करियर बनाना भर नहीं है। इसलिए वे काफी गंभीर होते हैं।"

आपने लिखा है कि किसी देश को समझना है तो उसकी सड़क पर जाओ। किताब से नहीं समझ सकते, इसका क्या अर्थ है? वजाहत का जवाब था, "खास लोग हर जगह खास होते हैं। सड़क पर चलने का आशय यह है कि सामान्य लोगों के जीवन का आपको अनुभव हो।" उन्होंने जार्डन में युज्ड खिलौनों की दुकान और पाकिस्तान के कराची के डाउन टाउन में पैदल घूमने के दौरान कराची चेंबर ऑफ कॉमर्स की गांधी जी द्वारा उद्घाटित बिल्डिंग का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसी ढेरों बातें आप पैदल चलकर ही जान सकते हैं। पाकिस्तान में जिस लाहौर नहीं देख्या पर विवाद की चर्चा करते हुए वजाहत ने बताया कि खालिद अहमद ने हबीब तनवीर का निर्देशित नाटक देख अपने यहां करना चाहा, तो सरकार ने उसे तीन बिंदुओं पर अनुमति देने से मना कर दिया। पहला, लेखक भारतीय है। दूसरा, इसमें मौलवी की हत्या हुई है। तीसरी, इसकी केंद्रीय पात्र बुढ़िया हिंदू है। बाद में जर्मन इंफार्मेशन सेंटर में यह नाटक हुआ, तो अखबारों ने लिखा कि यह नाटक धार्मिक सहिष्णुता पर है। वजाहत ने इस नाटक के पंजाबी, मराठी और कन्नड़ मंचन का भी जिक्र किया।

हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी विवाद से जुड़े सवालों पर वजाहत का उत्तर था, "भाषाएं बनती हैं, बदलती हैं लोगों के माध्यम से। हिंदी में अंग्रेजी शब्द सौ से भी अधिक सालों से आए हैं। हमें इनका भारतीयकरण करने की जरूरत है, विरोध करने की नहीं। वैज्ञानिक कहते हैं कि हिंदी और उर्दू एक ही भाषा है क्योंकि इनका बुनियादी व्याकरण एक है। ऐसे में हमें एक-दूसरे की संपदा से लाभ उठाना चाहिए। हिंदी को उर्दू से लेना चाहिए। उर्दू को हिंदी से लेना चाहिए।" पाकिस्तानी शायर इब्ने इंशा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हमें एक-दूसरे से लेने, सीखने की जरूरत है विरोध की नहीं। भाषा के प्रति हमारा दृष्टिकोण उदार होना चाहिए। आपने इतना ज्यादा लिखा है? क्या आपको लगता है कि आपके चरित्र आपके साथ हैं? वजाहत का उत्तर था, "लेखक के लिए जरूरी है कि आप लोगों के साथ घुलमिल जाएं। उनका हिस्सा बन जाएं। लेखक से कोई कुछ ले नहीं जाता, बल्कि उसे दे ही जाता। कोई अनुभव, कोई जानकारी, कोई आइडिया। इसलिए लोगों से संपर्क बहुत जरूरी है।"

एक पर्यटक के रूप में किस देश की सड़क पर घूमना चाहते हैं? वजाहत का उत्तर था, "मैं संसार की हर सड़क पर, हर आदमी से मिलना चाहता हूं। इच्छाएं अनंत हैं। पर जापान और अफ्रीका के कुछ देशों में जाना चाहता हूं। मैं सोशल टूरिज़्म में भरोसा करता हूं। उन्हीं के ट्रांसपोर्ट से, उन्हीं की तरह, उन्हीं की व्यवस्था से घूमना चाहता हूं।" मीडिया के साथ पुराने संबंध का जिक्र करते हुए वजाहत ने कहा कि मैं हमेशा हाशिए पर रहा, अभी भी राजकुमार संतोषी के साथ एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहा। दरअसल खरीदने-बेचने में मैं बहुत कमजोर हूं। गलत खरीद लेता हूं, गलत चीज बेच देता हूं। अपने चित्रकला प्रेम पर उन्होंने कहा कि कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं बुनियादी तौर पर चित्रकार हूं। बचपन से मैं चित्र बनाना चाहता था। चित्रकला मैं पढ़ना चाहता था, पर पढ़ नहीं पाया। चित्रकला मेरे लिए बहुत गंभीर विषय है। यह मेरी कमजोरी है, दीवानगी है। वजाहत ने बताया कि उन्होंने तुलसीदास पर एक नाटक लिखा है, जिसे रंगकर्मी संजय उपाध्याय निर्देशित करेंगे। राजेंद्र गुप्ता इसमें तुलसी की भूमिका करेंगे। इसके अलावा मैं कथेतर विधा में लिख रहा हूं। संस्मरण लिख रहा हूं।

सवाल जवाब के सत्र का संचालन श्वेता अग्रवाल ने किया। इस दौरान वजाहत ने वेदुला रामालक्ष्मी, चैतन्य अरोड़ा, दिव्या, निहारिका, सुशील भाटिया के सवालों के उत्तर दिए। अग्रवाल सभी का आभार व्यक्त किया। अहसास वूमेन की अंशू मेहरा, गरिमा मित्तल, श्वेता अग्रवाल ने सक्रिय भूमिका निभाई।

#कलम फरीदाबाद & मेरठ के प्रायोजक हैं श्री सीमेंट। होटल क्रिस्टल पैलेस, दैनिक जागरण और अहसास वूमेन ने सहयोग किया।

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