Shazi Zaman

Shazi Zaman

31st October 2020

इतिहास की अपनी सीमाएं हैं, इसलिए अकबर पर उपन्यास लिखाः शाज़ी ज़माँ

मानवीय संबंध के अलग-अलग पक्ष होते हैं। कुछ संबंधों में रुमानियत होती है, कुछ में रूहानियत होती है, तो कुछ में जिस्मानियत होती है। मैंने रुमानियत और जिस्मानियत रिश्तों पर तो लिख लिया है, एक दिन शायद रूहानियत संबंधों पर भी कुछ लिखूंगा। कलम जालंधर सत्र में यह कहना था पत्रकार और लेखक शाज़ी ज़माँ का। अहसास वूमेन और प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से रुही वालिया स्याल ने अतिथि वक्ता जमां और श्रोताओं का स्वागत व धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कोरोना महामारी का जिक्र करते हुए कलम के सत्रों के वर्चुअल होने की बात कही। अतिथि लेखक ज़माँ का परिचय देते हुए स्याल ने बताया कि आप तीस साल से भी अधिक समय से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हैं। लेखन के क्षेत्र में आपकी पहचान प्रेमगली अति सांकरी और जिस्म जिस्म के लोग जैसे उपन्यासों से बन गई थी, पर अपने नए उपन्यास अकबर से आप एक अलग मुकाम पर पहुंच गए। आगे के संवाद के लिए उन्होंने अहसास वूमेन मेरठ से जुड़ी डाइटिशियन, न्यूट्रिशन लेक्चरर और साहित्य की समर्थक अंशु मेहरा को कमान सौंपी।

मेहरा ने ज़माँ से पहला सवाल उनके बचपन को लेकर पूछा? ज़माँ का जवाब था स्वाभाविक रूप से एक लेखक का बेटा होने का असर मुझ पर पड़ा। मैंने जब आंखें खोलीं तो मेरे चारों तरफ किताबें थीं। हर पिता के कहने, बोलने, लिखने का असर बच्चे पर पड़ता है। वह खुद एक उम्दा लेखक थे। कालजयी कृतियां लिखीं, तो जाहिर है एक प्रभाव छोड़ा होगा। मैं उनकी उंगली पकड़ कर कॉफी हाउस में चला जाता था। मैंने लिखना बाद में शुरू किया। जब मैं बीबीसी में काम करने लंदन गया तो बहुत तन्हां था। वहीं अकेलेपन के बीच लिखना शुरू किया। वहां से लौटा तो मेरे पास एक अप्रकाशित पांडुलिपी थी। यहां एक दिन चर्चित लेखक राजेंद्र यादव से प्रेस क्लब में मुलाकात हुई तो मैंने उन्हें वह उपन्यास पढ़ने के लिए दिया, जो हंस में अलविदा बीसवीं सदी नाम से छपा। बाद में यह प्रेम गली अति सांकरी नाम से छपा।" क्या यह प्रेम उपन्यास है? ज़माँ का जवाब था, जब लिख रहा था, तब पता नहीं था कि यह एक प्रेम कथा है। उन्होंने इस उपन्यास का एक अंश पढ़ कर भी सुनाया। इसी तरह जिस्म जिस्म के लोग की चर्चा में उन्होंने इस उपन्यास की प्रस्तावना पढ़ कर सुनाया।

आपने अपने उपन्यास के लिए मुगल सम्राट अकबर का ही चयन क्यों किया? और बीस साल के लंबे शोध के बाद इतिहास की जगह इसे उपन्यास के रूप में क्यों लिखा? के जवाब में ज़माँ ने कहा, "देश को, दुनिया को समझने के लिए इतिहास पढ़ना जरूरी है। इतिहास को जानने के लिए जब आगे बढ़ते हैं तो एक समय खामोशी भरा मुकाम भी आ जाता है। उसका कारण है कि इतिहास व्यक्ति को दर्शाता है, घटनाओं और तथ्यों को दर्ज करता है, पर वह मनः स्थिति का बयान नहीं करता। हम सिर्फ वही जान पाते हैं जो इतिहास में दर्ज है। इसलिए कल्पना का भी सहारा लेना पड़ता है। अकबर को समझने के लिए मैंने उस दौर के लेख, प्रकाशित सामग्री जो किताबों आदि में दर्ज है, उन्हें पढ़कर जाना। यह समझ में आया कि अकबरनामा लिखवाकर अकबर चाहते थे कि उन्हें इस रूप में जाना जाए। मैंने उनके विरोधियों, वैष्णव संतों आदि की बातें भी जानी। यह भी समझने की कोशिश की कि 'दीन-ए-इलाही' को सोचते हुए उनके मन में क्या चल रहा होगा, उनके बड़े फैसलों के पीछे क्या सोच रही होगी? जाहिर है इसके लिए तथ्यों के साथ ही कल्पना का सहारा लिया गया।"

अकबर ही क्यों के जवाब में उन्होंने कहा शायद बचपन से उन्हें लेकर आकर्षण था। अकबर देखने में कैसे थे? के जवाब में ज़माँ ने कहा कि जितना मैं जान सका, उसके लिहाज से के. आसिफ काबिलेतारीफ हैं। वाकई पृथ्वीराज कपूर की कद, काठी शक्ल अकबर से मिलती हैं। मैंने जो मिनीएचर देखे, उनमें और मुगल-ए-आजम के अकबर में समानता है। अकबर का जिरह बख्तर मुंबई के संग्रहालय है, उसे देखकर भी मैंने अंदाज लगाया। ईसाई पादरियों, जहांगीर ने भी अकबर का जो वर्णन किया है, उसमें उनकी भारी आवाज, पैनी नजर का जिक्र है। ज़माँ ने अकबर की जिंदगी के कई पहलुओं की चर्चा की। उन्होंने बताया कि अकबर के जीवन में ऐसा वक्त आया जिसे 'हालते अजीब' कहा गया। इसके बाद उन्होंने इस वाकिए से जुड़े अपने पुस्तक अंश को भी पढ़कर सुनाया और कहा कि अबुल फजल ने भी इसका जिक्र किया है। 'दीन-ए-इलाही से जुड़े सवाल पर ज़माँ का जवाब था, अकबर चाहते थे कि अलग-अलग धाराओं के लोग एक मंच पर संवाद करें, उनमें सामंजस्य हो। अबुल फजल कह रहे थे कि बादशाह सलामत रुहानी नुमाइंदगी भी कर सकते हैं। वह रुहानी पेशवा भी थे। अकबर को लगता था कि वह ऐसी हुकूमत के बादशाह हैं, जिसमें अलग-अलग मजहब के लोग हैं। अपनी पुस्तक के कवर पर ढाल के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह मुंबई के संग्रहालय में मौजूद है। इसके चारों तरफ राशियां हैं। इसमें सूर्य बीच में है। बहुत से लोग मानते हैं कि बादशाह अकबर सूर्य के उपासक थे।

क्या आपके तीनों उपन्यासों में कोई तादात्म्य है, जो इन्हें जोड़ता है? ज़माँ का जवाब था, "यह कहना मुश्किल है। इंसान में कुछ कहने की ख्वाहिश होती है, जब वह अपने आसपास को देखता है। अकबर के माध्यम से मैंने अपने समय से पीछे देखने की कोशिश की है। शेष दोनों में मैंने मानवीय संबंधों को समझने की कोशिश की है।" पत्रकार व उपन्यासकार से जुड़े सवाल पर ज़माँ ने कहा कि पत्रकारिता मेरा प्रोफेशन भी है, शौक भी। ये दुनिया को देखने का नजरिया है। उपन्यासकार को एक छूट होती है। उसका कैनवास बड़ा है। वह अपने समय के पीछे भी जा सकता है। अकबर के दौरान मैं कुछ और ऐतिहासिक उपन्यास पर काम कर रहा हूं। अकबर-जोधा के सवाल पर ज़माँ का उत्तर था कि यह सही है कि अकबर की शादी आमेर के राजा भारमल की बेटी से हुई थी, पर उनका नाम जोधाबाई नहीं है। उन्होंने अकबर की बीमारी के दौरान चल रही उनकी मनःस्थिति का जिक्र करते हुए अपनी पुस्तक का एक अंश भी पढ़ा और यह दावा किया कि आखिरी दिनों में अकबर का अकेलापन बढ़ गया था। उन्होंने यह भी कहा कि अकबर एक चुंबकीय व्यक्तित्व के स्वामी थे। वीरता, उदारता, बुद्धिमता, कीर्ति का संगम थे। यह बात उनके दरबारियों में शामिल बीरबल, तानसेन, अबुल फजल, मान सिंह आदि की मौजूदगी से भी जानी जा सकती है।

#कलम जालंधर के प्रायोजक हैं श्री सीमेंट। दैनिक जागरण और अहसास वूमेन जालंधर ने सहयोग किया।

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