Manoj-Muntashir

Manoj Muntashir

18th October 2020

प्रकृति को देना होता है तो वह आपको चुन लेती हैः मनोज मुंतशिर

सरहद पे गोली खाके जब टूट जाए मेरी सांस मुझे भेज देना यारों मेरी बूढ़ी मां के पास... गीतकार मनोज मुंतशिर ने कलम ओस्लो के दौरान देश पर कुर्बान होने वाले सिपाहियों के आखिरी पलों को शब्द देकर श्रोताओं की आंखें नम कर दीं। आरंभ में राज नरुला ने मुंतशिर का स्वागत किया और संवाद के लिए मनोज मिश्र को बुलाया। मिश्र ने कहा कि अपनी भाषा अपने लोग की सोच से मेरी फितरत है मस्ताना के रचनाकार मुंतशिर ने कलम की ताकत को जितना बढ़ाया वह प्रशंसा योग्य है। आखिर मनोज शुक्ला के मनोज मुंतशिर बनने की यात्रा कैसे हुई? मुंतशिर का जवाब था, "मैं न तो इतनी तारीफों के लायक हूं, न ऐसी शोहरत का हकदार...मेरे पिता जनेऊधारी ब्राह्मण हैं। पूजा, अर्चना, कर्मकांड, पुरोहित का काम करते हैं। मेरी परवरिश सनातनी माहौल में हुई। पर मैं जहां पैदा हुआ वह अवध की मिट्टी मजहबी एकता की पहचान है। वहां हिंदू-मुसलमान नहीं है। उर्दू की ओर मेरा झुकाव शुरू से था। जब मैं लिखने लगा तो तखल्लुस तलाशने लगा। मैंने कई तरह के पेन नेम ढूंढे। ऐसी ही तलाश में एक दिन अपने कस्बे गौरीगंज में चाय की एक टपरी पर रेडियो पर मुशायरा चल रहा था, जहां सुना, मुंतशिर हम हैं तो रुख़्सारों पे शबनम क्यूँ है, आइने टूटते रहते हैं तुम्हें ग़म क्यूँ है... मुझे यह जम गया। मनोज के साथ मुंतशिर रख के देखा तो उसकी ध्वनि भारी थी। फिर तो मुंतशिर इस तरह जुड़ा कि घर की नेम प्लेट पर भी जुड़ गया।"

मिश्र का अगला सवाल था, आपको लिखने की प्रेरणा कैसे मिली? मुंतशिर का जवाब था, "प्रेरणा वहीं से मिली जहां से तुलसी दास को मिली। इश्क न हो तो कविता हो ही नहीं सकती। कलाकारों के जीवन में नौ रस तभी आता है जब इश्क हो। जुनून हो। निजता विलीन होती है, तब कविता का रास्ता खुलता है। ग्यारहवीं का मेरा इश्क था। मैं तब लेखक बनना चाहता था। पर लड़की को लेखन में भविष्य नहीं दिखा। उसने लेटर्स व फोटोग्राफ वापस मांगे, तो मेरा जवाब था। तुम पर मेरा इन्वेस्टमेंट पूरे दो साल हैं? फिर मैंने लिखा, आंखों की चमक जीने की लहक सांसो की रवानी वापस दे, मैं तेरे खत लौटा दूगा तू मेरी जवानी वापस दे... मोहब्ब्त आंखों की चमक देती है, तो नूर वापस भी ले जाती है। सलाम करते हैं रस्ते भी उस मुसाफिर को, जिनके पांव में हर रोज छाले आते हैं...."

आपके गानों ने रैप कल्चर को बदल दिया? पर मुंतशिर का उत्तर था, "हमने कांसेस तरीके से कुछ नहीं किया। मुझे कविता लिखना ही आता था। मैंने लिखना शुरू किया तो ऐसे गाने चुभते थे. तू लड़की पो पो पो...माने न माने टिंकू जिया...आदि। तो मुझे लगता था, जिन्हें पढ़ सुनकर मैं बड़ा हुआ, वह गलत था क्या? मैं जब टीवी के लिए लिखने लगा तब तेरी गलियां लिखा, जिसने मेरी ज़िदगी को बदल दिया... उस वक्त को मेरा कंधा मिल गया। और एक वक्त ऐसा आया कि म्युजिक चार्ट पर दस में से छः गाने मेरे थे।" अमेठी से मुंबई की यात्रा कैसे हुई? के जवाब में मुंतशिर ने बताया, "किसान का बेटा हूं। धान की फसल एक खेत में बोई जाती है और दूसरे में परवान चढ़ती है। तरक्की के लिए अपरूट होना जरूरी है। 1997-98 में इलाहाबाद जा रहा था। प्रतापगढ़ में ट्रेन खराब हो गई। तो स्टेशन पर किताब की दुकान से साहिर लुधियानवी की 'तल्खियां' पुस्तक खरीद ली, जिसके पहले पन्ने पर लिखा था, दुनिया ने तजुर्बों की शक्ल में जो दिया उसे लौटा रहा हूं. इलाहाबाद की उस यात्रा में किताब पढ़कर मैं तय कर चुका था कि मुझे यही बनना है।"

मेरी मिट्टी में मिल जावां कैसे लिखा? पर मुंतशिर का जवाब था, "ऐसे गानों का क्रेडिट कोई ले नहीं सकता। कभी-कभी प्रकृति को देना होता है तो वह आपको चुन लेती है। हम वतन परस्त लोग हैं। फिर भी ऐसे गाने लगातार नहीं लिखे जा रहे थे। केसरी के दौरान करण जौहर की ऑफिस से फोन आया और वह सिक्वेंश दिखाया गया. उस वक्त मैंने सोचा और लिखा था- ऐ मेरी ज़मीं, अफसोस नहीं जो तेरे लिए सौ दर्द सहे महफ़ूज़ रहे, तेरी आन सदा चाहे जान मेरी ये रहे न रहे...फिर मैं सोचने लगा कि एक सिपाही को जब सरहद पर गोली लगती है और उसके पास चंद सेकंड होते हैं तो वह क्या सोचता होगा. फौजी को मौका मिले तो उसकी आखिरी चिट्ठी कैसी होगी?

हिंदी-उर्दू से जुड़े सवाल पर मुंतशिर का जवाब था, "हिंदी उर्दू को लेकर बहुत गलतफहमियां हैं। संस्कृत दुनिया की सभी भाषाओं की माता है। पर संस्कृत जनसाधारण की भाषा कभी नहीं थी। प्राकृत और पाली आम भाषा थी। अरबिक लिपी में लिखते हैं तो उर्दू है। देवनागरी में लिखते हैं तो हिंदी है। यह हमारी मिलीजुली संस्कृति का हिस्सा है। मुंतशिर ने इसके बाद बाहुबली के डायलॉग लेखन से जुड़ा अपना और एसएस राजामौली का किस्सा भी सुनाया। कोविड-19 के लॉकडाउन के दौरान क्या काम किया? पर मुंतशिर का उत्तर था, "लेखक को आदत होती है लॉकडाउन की। लेखक तो बंद होकर ही लिखता है। मैंने इस दौरान नीरज पांडेय की फिल्म चाणक्य की कहानी और डायलॉग लिखा। बाहुबली के बाद यह एक ऐसी फिल्म है, जिसपर देश नाज करेगा। एक भारत अखंड भारत का विचार ही चाणक्य की देन है।"

मुंतशिर ने इस संवाद के दौरान वरिंदर एस जायसवाल, धीरेंद्र कांत शुक्ला, अमरजीत, चंद्रमोहन मेहता, कुलजश सागर आदि के सवालों के जवाब भी दिए और बॉलीवुड के अपने अनुभव, सुशांत सिंह राजपूत, यूपी में फिल्म इंडस्ट्री आदि पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा हमारे सिनेमा के पास भाषा है, पर जमीन नहीं है। यह बंटवारा नहीं है विस्तार है। मुंबई महंगा शहर है। न जाने कितने सपने इसलिए मर जाते हैं कि मुंबई नाम का दानव उनके सामने आकर खड़ा हो जाता है। इसी तरह एक सवाल के उत्तर में उन्होंने कहा कि सपने इसलिए टूट जाते हैं, क्योंकि कोई फरिश्ता नहीं आता। चमत्कार का इंतजार न करें। जो करना है खुद से करना है। श्रोताओं के अनुरोध पर मुंतशिर ने, जूते फटे पहन के आकाश पे चढ़े थे, सपने हमारे हरदम औकात से बड़े थे और लपक के जलते थे बिल्कुल शरारे जैसे थे, नए नए से थे हम भी बिल्कुल तुम्हारे जैसे थे की पंक्तियां भी सुनाईं। चंद्रमोहन मेहता ने आभार व्यक्त किया।

कलम ओस्लो का आयोजन प्रभा खेतान फाउंडेशन ने विश्व हिंदू परिषद नॉर्वे के सहयोग से किया

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