Deepak-Ramola

Deepak Ramola

30th November 2020

जीवन आसान जवाबों का नहीं मुश्किल सवालों का सफर हैः दीपक रमोला

मैंने अपने जीवन को इस तरह उबारा। डूबा हूँ हर रोज़ किनारे तक आ-आकर लेकिन मैं हर रोज उगा हूँ जैसे दिनकर बनकर। इससे मेरी असफलता भी मुझसे हारी, मैंने अपनी सुंदरता भी इस तरह संवारी... कक्षा 9 की यह वह कविता थी, जिसे मेरी शिक्षिका ने यह कहकर याद कराया था कि जीवन के हर दौर में इससे तुम्हें सीख मिलेगी। मैं मानता हूं कि उनकी बात सही है। यह कहना है कलम चंडीगढ़ के वर्चुअल सत्र में शामिल लेखक, कलाकार दीपक रमोला का।

कार्यक्रम के आरंभ में अहसास वूमेन की शालू गोयल ने प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा जारी कार्यक्रमों की चर्चा की और बताया कि फाउंडेशन भारत और दुनियाभर के करीब तीस शहरों में साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ ही महिलाओं को सशक्त बनाने के अभियान से जुड़ा है। 'कलम' भी इसी पहल का एक हिस्सा है। अतिथि लेखक रमोला का परिचय देते हुए उन्होंने बताया कि देहरादून निवासी रमोला लेखक, अभिनेता, शिक्षक, वक्ता और गीतकार हैं। आपने अपनी पहली क‌विता 12 साल की उम्र में ही लिख दी थी। आप का काव्य संग्रह 'इतना तो मैं समझ गया हूं' काफी चर्चित रहा है। आपने 'मांझी द माउंटेन मैन' और 'वजीर' सहित अब तक दर्जन भर फिल्मों के लिए गीत भी लिखे हैं। फिल्म तथा टीवी धारावाहिक में ऐक्टिंग भी की है। उन्होंने रमोला द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट फ्यूल की विस्तार से चर्चा की और आगे के संवाद के लिए अहसास वूमेन जोधपुर से जुड़ी प्रीति मेहता को बुलाया।

मेहता ने रमोला से पहला सवाल प्रोजेक्ट फ्यूल को लेकर ही किया। रमोला ने बताया, "इसकी प्रेरणा मुझे मेरी मां से मिली, जिन्हें पांचवीं कक्षा में ही मेरी दादी ने स्कूल से निकाल दिया था। मेरी मां स्कूल भले ही नहीं गई थी, पर हर मसले पर उनका विवेक बहुत कारगर साबित होता था। वह मानती हैं कि जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है और जिंदगी से हम बहुत कुछ सीखते हैं। यही वजह है कि मैं आम लोगों के जीवन की कहानियां जुटाने लगा और इस प्रोजेक्ट के तहत लोगों तक पहुंचाना शुरू किया। इसके चार माध्यम हैं, पहला माध्यम शिक्षा है। दूसरा माध्यम है आर्ट, जिसके तहत हम वाइज वाल प्रोजेक्ट करते हैं। तीसरा माध्यम मीडिया है जिसके तहत हम फिल्म बनाते हैं। चौथा है फेस्टिवल। सोशल मीडिया भी इसका एक बड़ा टूल है।" उन्होंने सोड़ गांव की चर्चा की, जो पलायन के कारण खंडहर बन चुका था, और जहां के हर घर की बंजर दीवारों पर उनकी कहानियां उकेर दी गईं।

स्पेशली एबल्ड बच्चों की चर्चा पर रमोला ने कहा, "मैं लाइफ लेसंस पढ़ाना चाहता था। पर मैं सत्रह साल का था तो मुझे मौका कौन देता। मैंने अहसान फाउंडेशन के लोगों से संपर्क कर खुद उनसे जुड़ा। बाद में भारत भर में पढ़ाया। हम जब किसी को स्पेशली एबल्ड कहते हैं, तो पहले ही उन्हें दरकिनार कर देते हैं। हमें जोड़ने वाला सवाल करना चाहिए। मुझे यह काम करके कृतज्ञता महसूस होती है कि कितना कुछ है, करने व जानने के लिए।" युनेस्को के काइंडनेस अंबेसडर के सवाल पर रमोला ने कहा, "पद तो कथनी है। पर आपका असली महत्त्व आपकी करनी है। हर व्यक्ति हर दिन कम से कम तीन सौ बार हारता है और अगले दिन सुबह जग कर सोचता है कि आज यह दो सौ निन्यानबे हो।" लेखन से प्रेम कैसे हुआ? पर रमोला ने बिस्तार से अपनी लेखकीय यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि स्कूल में मेरी हिंदी की अध्यापिका ने शब्दों से प्रेम, भाषा से प्रेम जगाया। मेहता के अनुरोध पर रमोला ने अपने काव्य-संकलन 'इतना तो मैं समझ गया हूं' से एक कविता सुनाई।

अपनी फिल्मी यात्रा से जुड़े सवाल पर, रमोला ने कहा कि इसकी कोई गहन कहानी नहीं है कि कहां से फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। अपनी नई पुस्तक 50 टफेस्ट क्वेश्चंस ऑफ लाइफ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि डायरी, कंप्युटर, पन्नों से निकलकर शब्दों का किताब के रूप में ढलना बड़ी बात लगती है। इस पुस्तक का लेखन एक गेम की तरह था। जीवन आसान जवाबों का सफर नहीं बल्कि मुश्किल सवालों का सफर है। डेढ़ साल तक मैंने सवाल जुटाए खुद के लिए। पांच साल इन सवालों से एक गेम की तरह खेला। क्या यह पुस्तक युवाओं के लिए है, के जवाब में उन्होंने कहा कि उम्र के हर पड़ाव पर जवाब बदलते रहते हैं। यह पुस्तक उम्र का बैरियर तोड़ती है। इसमें दर्शन नहीं है। इसमें सवाल हैं, जवाब में मेरा दृष्टिकोण है।

एंस्पायरिंग लेखकों के लिए क्या सलाह है? के जवाब में रमोला ने कहा, "लेखक के लिए आज लिखने का मतलब केवल छपना नहीं है। पहले ऑडिएंस स्टैब्लिश करिए। आपके पास पाठकों तक पहुंचने के उपाय हैं या नहीं। ईमेल, सोशल मीडिया, वर्डप्रेस से आप पहुंचकर देखिए। यह केवल प्रकाशक की जिम्मेदारी नहीं है। मैं जिन लोगों से बात कर रहा हूं, उनसे मैं पहले से जुड़ा हूं, इसलिए मेरी किताब का रीप्रिंट होना अचरज की बात नहीं है।" हिंदी-अंग्रेजी में लेखन के सवाल पर रमोला ने कहा कि हम मनुष्य हैं। हम भाषा कहते नहीं, करते हैं। हम भाषा जीते हैं। पढ़ने से भाषा को इस्तेमाल करने का मन होता है। प्रोजेक्ट फ्यूल का क्या आपके जीवन पर, लेखन पर असर पड़ता है? रमोला का उत्तर था, "हां असर पड़ता हूं। मेरी नौकरी है कि मैं लोगों की कहानियां सुनूं। उन्हें सुनकर मैं उनको अपनी कविताओं में पिरोता हूं।" रमोला ने भारत-पाकिस्तान का जिक्र करते हुए गुलज़ार साहब के शब्दों का उल्लेख किया और अपनी 'इजाजत' नामक कविता भी सुनाई-

काश कभी आंख मसलते हुए,सुबह जब दरवाजा खोलूं तो दहलीज़ के उस तरफ़ खड़ा हो दूसरा मुल्क, ना दरारें, ना दीवारें, ना सन्नाटा, ना शिकायतें बस इजाज़त एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने की...

आगे के सफर में क्या? के जवाब में उन्होंने एक पत्रकार से अपनी वार्ता का जिक्र किया। बताया कि दो और किताबें हैं, जो मुझे अगले तीन साल में लिखनी हैं। न्यूयॉर्क के डाटा साइंटिस्ट के साथ मिल कर भी काम कर रहे हैं। पर भविष्य क्या है यह पता नहीं। हरमन जी के सवाल पर उन्होंने कहा मैं प्रकृति से, लोगों से सीखता हूं। शर्मिता भिंडर के सवाल पर कि व्यक्ति किताब लिखता है या किताब व्यक्ति को? रमोला ने कहा कि दोनों दोनों को लिखते हैं। सच तो यह है कि अनुभव आपको लिखता है। उन्होंने अपनी पुस्तक से एक सवाल व उसपर अपना विचार भी बताया। परी के सवाल पर रमोला ने गार्डनिंग, पेंटिंग, आलू परांठा, म्युजिक प्लेयलिस्ट को लेकर अपने शौक का जिक्र किया और कहा कि शुक्रवार की शाम को हमारी ऑफिस में एक घंटे पेंटिंग जरूर होती है। अहसास वूमेन की मनीषा जैन ने धन्यवाद दिया।

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