Anshu-Harsh-2

Anshu Harsh

20th December 2020

सिनेमा को समाज चाहिए और समाज को सिनेमा: अंशु हर्ष

ख़ामोशी में है शब्दों का समंदर
जब कभी खामोश रहती हूं.
उस समंदर में डूब कर
मन के जाल में कई शब्दों को पकड़ लाती हूं...प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से आयोजित कलम न्यूयॉर्क में अपनी यह कविता पढ़ी अतिथि वक्ता अंशु हर्ष ने। कोरोना काल के चलते वर्चुअल आयोजित इस सत्र में हर्ष का स्वागत, धन्यवाद और संवाद किया अनूप भार्गव ने। अतिथि वक्ता का परिचय देते हुए भार्गव ने बताया कि हर्ष एक कवयित्री और फिल्म निर्देशक हैं। आप मासिक पत्रिका सिम्पली जयपुर'और साप्ताहिक समाचार पत्र वॉइस ऑफ़ जयपुर की संपादक और प्रकाशक हैं। इनकी कविताएं एक अधूरी पेंटिंग का अहसास दिलाते हुए कवयित्री द्वारा उसे जल्द पूरा करने की हड़बड़ी का अहसास भी दिलाती हैं। शब्दों का समंदर आपका चर्चित काव्य संग्रह है। आप राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की निदेशक भी हैं।

भार्गव ने कार्यक्रम की शुरुआत में कहा कि जब हम अपनी मिट्टी से जुड़े लोगों से जुड़ते हैं तो एक अलग खुशी होती है। आप अपने बचपन से अब तक सफर के बारे में कुछ बताइए? हर्ष का उत्तर था, "बचपन की बात पर एक चुलबुलापन याद आ जाता है। जन्म जयपुर में हुआ। पिता पुलिस अफसर थे तो ट्रांसफर के साथ जगह बदल जाती थी, लोग बदल जाते थे, माहौल बदल जाता था, दोस्त बदल जाते थे। तब बहुत दुख होता था, पर आज जीवन के उतार चढ़ाव में उस दौर से बहुत मदद मिलती है। तनाव के माहौल में सहजता मैंने अपनी मां से सीखा।" आपका व्यक्तित्व विविध आयामी है, आपकी कविताओं में सहज अनुभूति है। आपकी जो सोच व रुचि है, उनमें किन बातों का योगदान रहा? हर्ष का उत्तर था, "बचपन में चंपक, नंदन, चंदामामा, बाल हंस, सुमन सौरभ आदि पत्रिकाएं पढ़ीं, तो इन पत्रिकाओं का बहुत असर हुआ। वर्ष 2000 में शादी हो गई थी। 2008 में मैंने एक अखबार के लिए लेख लिखा, जिसे अवार्ड मिल गया, तब लिखना शुरू कर दिया। फ्रीलांस लिखती रही। बाद में मैंने कविताएं लिखीं।" हर्ष ने बताया कि उनके कविता संग्रह का अंग्रेजी अनुवाद आखिरी चरण में है। एक अन्य सवाल पर उन्होंने बताया, "2012 में हमने द्विभाषी पत्रिका निकाली। इसमें हमारी संस्कृति के साथ ही लोगों की प्रेरक कहानियां इसलिए ली जाती हैं ताकि दूसरों को प्रेरणा दे सकें।"

लघु फिल्मों के निर्माण से जुड़े सवाल पर हर्ष का उत्तर था, "फिल्म फेस्टिवल के लिए काम करने के दौरान क्रिएटिव सोचती रहती हूं। एक फिल्म देखकर सोचा कि कोई महिला जब ऑटोबायोग्राफी लिखती है तो उसमें कितना सच होता है? इसी पर शार्ट्फिल्म बना दी। मेरा कहना है कि जब भी मैं ऑटोबायोग्राफी लिखूंगी तो उसमें सच लिखूंगी, इसीलिए इसका नाम मैंने टू बी कंटीन्युड रखा।" फिल्म फेस्टिवल और शार्ट फिल्म्स से जुड़े अनुभव व चुनौतियों पर हर्ष ने कहा, "मेरे जीवन में कुछ फिल्मों का बहुत योगदान था। थ्री इडियट्स फिल्म देखी तो इसका काफी असर हुआ। फिर राजस्थान की फर्स्ट द्विभाषी पत्रिका निकाली। फिल्म फेस्टिवल भी इसी सोच का नतीजा है। समाज और फिल्म एक दूसरे के पूरक हैं। पुराना सिनेमा सामाजिक सरोकारों का सिनेमा था। सिनेमा को समाज चाहिए, समाज को सिनेमा चाहिए। राजस्थान के स्टूडेंट्स केवल डॉक्टर, इंजीनियर और सरकारी नौकरी की तरफ सोचते हैं या हीरो बनना चाहते हैं, तो इसके माध्यम से हमने उन्हें बताने की कोशिश की कि सितारों के आगे जहां और भी है।" भार्गव ने इस दौर को हिंदी फिल्मों का रेनसां बताकर हर्ष की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो हर्ष का उत्तर था, "फिल्म फेस्टिवल ने कम बजट की फिल्मों को बढ़ावा दिया है। ऑफ बीट सिनेमा, शार्ट फिल्म, समानांतर सिनेमा, समाज व साहित्य से जुड़ा सिनेमा इससे आगे बढ़ा है।"

आगे की योजनाओं पर हर्ष का उत्तर था, "पत्रिका और फेस्टिवल एक कामर्शियल पहलू है। पर मैं खुद के लिए लेखन में मुकाम चाहती हूं। मैं उस जगह की हूं जहां की मीराबाई हैं।" अमृता प्रीतम का जिक्र होने पर उन्होंने कहा कि मीरा पुराने समय की हैं, अमृता आज के दौर की लेखिका हैं, दोनों से प्रेरणा लेती हूं। उनके विचार स्वतंत्र हैं, पर स्वच्छंद नहीं। श्रोताओं में से मनीष भार्गव ने पूछा कि इंजीनियरिंग के छात्रों में भी दूसरी क्रिएटिव प्रतिभाएं हैं, लेकिन वे आगे नहीं जा पा रहे। उन्हें क्या रोकता है? हर्ष का उत्तर था, "आपको खुद के अलावा कोई दूसरा नहीं रोक सकता। जब मैं दुख तकलीफ लिखती हूं तो वही नहीं लिखती जो मैं जीती हूं। मैं जगबीती लिखती हूं। बच्चों के पैरेंट्स को यह समझने की जरूरत है कि वे उन्हें बांधे नहीं।" संवादकर्ता भार्गव ने जोड़ा कि इंटरनेट ने प्रकाशन के लिए एक सशक्त माध्यम दे दिया है। आज एक स्मार्ट फोन से शॉर्ट फिल्म बनाई जा सकती है। न्यू जर्सी में रह रहे पुष्प विक्रम ने बताया कि वे भी पिलानी में पढ़े थे। थ्री इडियट्स उनकी भी पसंदीदा फिल्म है, जिसमें हंसी मजाक के साथ बहुत शिक्षा मिलती है।

श्रोताओं में से नीरजा ने पूछा, बतौर लेखक आप विषय कैसे चुनती हैं? हर्ष का उत्तर था कि जो मन में आता है उस पर लिखती हूं। विचार चाय की तरह होता है। कभी दो उबाल और कभी कड़क चाय। पसंदीदा विधा से जुड़े सवाल पर हर्ष का उत्तर था, "समय की दिक्कत है। कविता लिखती हूं। कम शब्दों में कहानी भी लिखा है। उपन्यास लिखने का मन है, पर विषय अभी दिमाग में नहीं है। अभी तो लोगों की प्रेरणा, जीवन, प्रेम व दुख की बात करती हूं।" दर्शकों के अनुरोध पर हर्ष ने कुछ कविताएं सुनाईं, जिनमें एक कविता थी, मेरे जीवन में तुम आए, तो एक कविता के बोल थे-
बहुत बरसों से एक नियम मैं हर रोज निभाती हूं
हर दिन नीयत समय पर रोज तुमसे मिलने आती हूं...
इस दौरान संवादकर्ता भार्गव ने भी अपनी कविता सुनाई-
सुनो तुम जानती हो
मेरा अस्तित्व तुमसे शुरू होकर
तुम पर खत्म होता है
फिर बता सकती हो तुम्हें मेरा विस्तार
अनंत सा क्यों लगता है...
श्रोताओं में मौजूद लेखक दुर्गा प्रसाद अग्रवाल के इस सवाल पर कि इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच तालमेल कैसे निभाती हैं? हर्ष का उत्तर था, "नैया तेरी राम हवाले, लहर लहर हरि आप संभाले... इस दौर ने एक चीज समझाई कि भौतिक संसार में होते हुए आध्यात्मिक होने की जरूरत है।" उन्होंने कोरोना समय के विश्लेषण पर आधारित पुस्तक की चर्चा की और सुनाया, जो जल में रहूं तो ऐसे रहूं जैसे जल में कमल का फूल रहे...उन्होंने उम्र से जुड़ी कुछ कविताएं भी सुनाईं और प्रभा खेतान जी को याद करते हुए कहा कि वह मारवाड़ी लड़कियों की मार्गदर्शक हैं।

प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से आयोजित कलम न्यूयॉर्क के सहयोगी थे झिलमिल अमेरिका

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