Author-Ahutosh-Bhardwaj-_-Conversationalist-Ramkumar-Tiwari

Ashutosh Bhardwaj

15th January 2021

आदिवासियों की स्थिति लिए हम सामूहिक रूप से जिम्मेदारः आशुतोष भारद्वाज

प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से कोरोना काल के वर्चुअल सत्रों के बाद पहली बार कलम बिलासपुर का आयोजन हुआ। यह इस शहर में कलम का ग्यारहवां आयोजन था, जिसमें साहित्य प्रेमी कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अतिथि वक्ता के रूप में युवा लेखक आशुतोष भारद्वाज को सुनने के लिए जुटे। कार्यक्रम के आरंभ में अहसास वूमेन व अभिकल्प फाउंडेशन की ओर से गौरव गिरिजा शुक्ला ने सबका अभिनंदन करते हुए कलम का परिचय दिया। उन्होंने अतिथि वक्ता भारद्वाज के स्वागत और परिचय के लिए अहसास वूमेन की गरिमा तिवारी को आमंत्रित किया।

तिवारी ने भारद्वाज का स्वागत और संक्षिप्त परिचय देते हुए बताया कि आप एक द्विभाषी पत्रकार, कथा लेखक और साहित्यिक आलोचक हैं। आपको पत्रकारिता में उत्कृष्टता के लिए लगातार चार बार प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पुरस्कार से नवाज़ा गया है। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में कहानी संग्रह, जो फ्रेम में न थे, साहित्य और सिनेमा पर निबंधों की पुस्तक पितृ वध और दंडकारण्य की एक रचनात्मक जीवनी द डेथ स्क्रिप्ट शामिल है। आप कहानियां, डायरी, यात्रा वृत्तांत और आलोचनात्मक निबंध भी लिखते हैं। उन्होंने भारद्वाज को मिले पुरस्कार व सम्मानों की चर्चा की और सूत्रधार रामकुमार तिवारी का भी परिचय दिया। तिवारी की पुस्तकों के उल्लेख के साथ आपने बताया कि आप एक उम्दा अनुवादक, कवि, कथाकार व संपादक हैं।

तिवारी ने पहला सवाल भारद्वाज की स्थानीयता को लेकर पूछा। जवाब में भारद्वाज ने कहा, "स्थानीयता का सवाल मेरे लिए संकट भरा है। तीन साल से शिमला में हूं। उससे पहले चार साल यहां था। मेरे खयाल से रचनाकार हर भूमि से कुछ न कुछ ग्रहण करता है।" नक्सल आंदोलन और बस्तर के अनुभव को बताने वाले फार्म के बदलाव की वजह पूछे जाने पर भारद्वाज का उत्तर था, "पहले मैंने इसे डायरी फार्म में लिखा था। फिर मुझे लगा कि डायरी और संस्मरण शायद अनुपयुक्त है, यह उपन्यास की काया में शायद यह सही ढंग से व्यक्त हो पाएगा। मैं अपने उन्हीं अनुभवों से इसे लिखा। लेकिन प्रकाशित होने के बाद मुझे लगा कि यह भी पूरा नहीं है, तब यह इस स्वरूप में आया। यह हर रचनाकार के साथ होता है। रचना खुद ही अपनी आंतरिकता के साथ विद्रोह करती रहती है। अनुभव एक फार्म के साथ आता है।"

आज नक्सल आंदोलन को किस रूप में देखते हैं? के सवाल पर भारद्वाज का उत्तर था, "आज नक्सल आंदोलन ढलान पर है। उनके पास दूसरी पीढ़ी के नेता नहीं हैं। भर्ती कम हो गई है। जनसमर्थन भी उतना नहीं रहा।" तिवारी के यह कहने पर कि किसी अनुभव को देखने का तात्कालिक नजरिया अब पर्याप्त नहीं है। चिपको और नक्सल आंदोलन जब शुरू हुआ तो जल, जंगल और जमीन को लेकर था। आपकी राय क्या है? भारद्वाज का उत्तर था, "मेरी समझ से उनका उद्देश्य पूर्ण क्रांति का है। नक्सल आंदोलन शुरू से तय है कि वर्तमान की व्यवस्था, संसदीय लोकतंत्र वह गरीब, पिछड़े, आदिवासी के अधिकारों की रक्षा करने में अक्षम है, इसलिए उन्हें अपनी सत्ता चाहिए। यह उनकी चेतना में बसा हुआ है।"

भारद्वाज ने चिपको आंदोलन व नक्सल आंदोलन को जोड़कर देखे जाने पर अचरज जाहिर करते हुए कहा कि दोनों के उद्देश्य, कार्यशैली, रणनीति, नेतृत्व सभी में एक दूसरे से बिल्कुल अलग है। चिपको आंदोलन ने यह बताया कि जंगल का प्रश्न मनुष्य का प्रश्न है। इससे स्त्रियां भी जुड़ीं। इसी तरह नक्सल आंदोलन ने हमें यह बताया कि आदिवासी का भी जीवन है। इसमें हिंसा है, पर इसने हमें आदिवासी से अवगत जरूर कराया। तिवारी ने इस पर विस्तार से प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि माओवादी विचारधारा में संस्कृति के लिए कोई जगह नहीं है। आदिवासी का राजनीतिक बदलाव बलात रूप से हुआ है? इस सवाल पर भारद्वाज का उत्तर था कि यह सही है कि आदिवासी जैसा सांस्कृतिक मनुष्य था वैसा नहीं रहा। पर इसके लिए केवल वही दोषी नहीं हैं। इसके लिए हमारा समाज, राजनीति और कॉरपोरेट भी जिम्मेदार है जो जंगल को केवल खनिज दोहन की जगह मानता है, जहां से सबकुछ उठा लेना है। आदिवासियों के विनाश लिए हम सब सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं।

आर्थिक उपनिवेश, भाषाई, वैचारिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक उपनिवेश के लिए हम सजग नहीं हैं, यह फैशन की तरह आ रहा है। वामपंथ में बदलाव व क्षरण पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भारद्वाज ने कहा कि हम बौद्धिक उपनिवेश, अंग्रेजी औपनिवेशिकता के अभी भी शिकार हैं। खास बात यह भी कि हम इसके प्रति सजग व सचेत भी नहीं हैं कि यह कितने स्तरों पर हमारी चेतना एक दूसरी भाषा व विचार से संचालित हो रही है। तिवारी ने भारद्वाज की आधुनिक साहित्य की समझ व आलोचना से अपनी असहमति को स्वाकार करते हुए उनकी नई पुस्तक 'पितृ वध' का उल्लेख किया और पूछा कि इसका शीर्षक एक पत्रकार ने रखा या साहित्यकार ने रखा? भारद्वाज का उत्तर था, "इसका शीर्षक मेरे मनुष्य ने रखा। पितृ वध का अर्थ किताब में मैंने यह दिया है कि कोई लेखक अगर सजग है तो वह जान जाता है कि पूर्व में उसने जिन्हें पढ़ा है वे उसकी चेतना पर सवार रहते हैं और उसके लेखन में उतर आते हैं। ऐसे में उसका पूरा संघर्ष उनसे मुक्ति पाने का होता है।"

तिवारी के इस उल्लेख पर कि विनोबा ने कहा था कि हम पुरखों के कंधे पर खड़े होकर देखते हैं? भारद्वाज का उत्तर था कि विनोबा लेखक नहीं थे। गांधीवादी होना उनके लिए सम्मान की बात है, पर किसी लेखक के लिए टॉलस्टॉयवादी कहलाना उचित नहीं है। बतौर कलाकार, हर कलाकार अपना स्वर पाना चाहता है। अच्छी आलोचना सिर्फ उस विषय की नहीं बल्कि आत्मालोचना भी होती है। यह इस पर भी निर्भर करती है कि हम अपने प्रतिपक्ष से कैसे टकराते हैं। अपने विपक्ष से किस तरह संवाद करते हैं। हम अपने को चुनौती देने वाले को कैसे जवाब देते हैं। अच्छा आलोचक अपनी मान्यताओं, अपने विचार व विश्वास से टकराता रहता है। यह सहज रचनात्मक कर्म है कि अपनी मान्यताओं को परिभाषित करते रहें।

शेखर एक जीवनी का उल्लेख करते हुए भारद्वाज ने कहा इसका नायक आत्ममुग्ध नायक है। तिवारी ने अज्ञेय व मैथिलीशरण गुप्त से जुड़ी एक घटना का उल्लेख किया। इस पर भारद्वाज ने अशोक वाजपेयी के एक लेख का उल्लेख किया और कहा कि यह हर किसी के साथ होना है। मुझे यह पता है कि मुझे भी नकार दिया जाएगा। यही सृष्टि का नियम है। भारद्वाज ने कृष्ण बलदेव वैद, निर्मल वर्मा, अज्ञेय, अशोक वाजपेयी, मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, मार्क्सवाद, अंधेरे में कविता आदि पर भी अपने विचार रखे। भारद्वाज ने सवाल-जवाब सत्र में यह भी कहा कि यह सत्ता और शक्ति की विफलता है। आखिर में अतिथि लेखक को स्मृति चिह्न डॉ मुक्ता दुबे और सूत्रधार को स्मृति चिह्न अरुंधती शर्मा ने दिया।

#कलम बिलासपुर के प्रायोजक हैं श्री सीमेंट। नई दुनिया और अभिकल्प फाउंडेशन ने सहयोगी की भूमिका निभाई।

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Gaurav-Girija-Shukla-Founder-Abhikalp-Foundation
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