Naveen Choudhary

23rd January 2021

राजनीति, राज्य को चलाने की नीतिः नवीन चौधरी/b>

कोरोना काल के लॉकडाउन में पूरी तरह से वर्चुअल माध्यम पर निर्भर हो चुके प्रभा खेतान फाउंडेशन के अपनी भाषा अपने लोग मुहिम के तहत चलने वाले कार्यक्रमों के जमीनी आयोजनों का उल्लास अब धीरे-धीरे लौटने लगा है। इसी क्रम में कलम पटना का भी आयोजन हुआ, जिसमें अतिथि वक्ता के रूप में लेखक नवीन चौधरी शामिल हुए। फाउंडेशन और अहसास वूमेन पटना की ओर से उनका स्वागत अनुभा आर्या ने किया। अतिथि वक्ता का परिचय देते हुए उन्होंने बताया कि बिहार के मधुबनी जिले में जन्मे और जयपुर में पले-बढ़े नवीन चौधरी उन लेखकों में शुमार होते हैं, जिन्होंने अपने पहले ही राजनीतिक उपन्यास से अपनी पहचान बना ली। राजस्थान विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में सक्रिय रहे चौधरी ने अर्थशास्त्र में मास्टर की डिग्री हासिल करने के बाद मार्केटिंग में एमबीए किया। आप कई डिजिटल माध्यमों के लिए लिखते हैं और एक अच्छे फोटोग्राफर भी हैं। आपका उपन्यास 'जनता स्टोर' दैनिक जागरण-नेल्सन की बेस्टसेलर सूची में शामिल है। आर्या ने चौधरी से संवाद के लिए पटना के जानेमाने रंगकर्मी अनीश अंकुर को आमंत्रित करते हुए उनका भी परिचय दिया।

अंकुर ने चौधरी से अपना विस्तृत परिचय देने, बिहार-राजस्थान से नाता और साहित्य में उपन्यास जैसी कठिन विधा को ही पहली रचना के रूप में क्यों चुना? के बारे में पूछा? चौधरी का उत्तर था, "मूल रूप से बिहार के मधुबनी जिले के रुद्रपुर के रहने वाला हूं। पिताजी की नौकरी राजस्थान में होने के कारण वहीं राजस्थान विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया। अकादमिक पढ़ाई में भले ही उतना मन नहीं था। वर्ष 2008-9 के दौरान ब्लॉग लिखना शुरू किया। ब्लॉग पर व्यंग्य की प्रतिक्रिया उत्साहित कर देने वाली थी, इसी ने साहित्य की ओर रूझान पैदा किया।" चौधरी ने बताया कि बातचीत वाली भाषा ही क्यों न लिखी जाए के बारे में बहुत सोचा, काफी कुछ पढ़ा भी। पहले दिमाग में आया कि प्रेम कहानी क्यों न लिखी जाए। 2016 में जेएनयू में काफी कुछ घट रहा था। मैं इस ओर नहीं जाना चाहता था कि कौन सही है, कौन गलत, पर लिखना चाहिए, यह सोचा।

चौधरी ने कहा कि साहित्य में इस प्रकार की बातें नई थीं। मैं नई चीज देना चाहता था। मार्केटिंग का अनुभव काम आया। मीडिया के संपर्क थे, पर ब्लॉग पढ़ने वालों ने काफी तारीफ की। आपके प्रिय लेखक कौन हैं, जिनसे प्रभावित हों? चौधरी का उत्तर था, कोई पैटर्न नहीं है। प्रेमचंद को काफी पढ़ा है। मन्नू भंडारी का फैन हूं। छिटपुट काफी पढ़ा है। अंकुर का अगला सवाल था, आपका उपन्यास किस्सागोई शैली में है, सरस है। शुरू में छात्र राजनीति से शुरू कर आखिर में राजस्थान के राजनीतिक परिदृश्य के साथ शासक वर्ग के अंतर्विरोध पर आ जाते हैं और अंत में राजनीति से अरुचि सी दिखती है? चौधरी ने उत्तर दिया, "राजनीति के प्रति लोगों की विचारधारा भले ही भिन्न हो सकती है, लेकिन बदलाव का जरिया इसी से आएगा।" एक सवाल के उत्तर में चौधरी ने कहा कि राजनीति, राज्य को चलाने की नीति है। इसने बाद में एक नकारात्मक रूप में हो गया। जनमानस राजनीति से अछूता नहीं रह सकता है।

राजनीति की समझ जिनके पास है, वे जानते हैं कि राजनीति कोई बुरी चीज नहीं है, जैसा कि लोगों ने बना दिया है। मैंने खुद अपने घर में नहीं बताया था कि मैं नुक्कड़ नाटक, रंगमंच और आंदोलन में भाग लेता हूं। राजनीति पर अगर सवाल उठाने वाले आगे नहीं आएंगे तो इसका मूल उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। राजस्थान में एक लड़की से बलात्कार की घटना का जिक्र करते हुए चौधरी ने वह घटना भी बताई जब पूरा गांव उनके घर में था। उन्होंने खेद जताया कि लोग रेपिस्ट के साथ होते हैं, जाति के नाम पर। लड़की के साथ जो हुआ उसका विरोध होना ही चाहिए था। मेरा मानना है कि छात्र राजनीति नहीं करेगा तो क्या गुंडा, मवाली करेगा। कॉलेज की राजनीति भी इसी तरह की है। जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषा, नाम आदि सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। जातिवाद का असर देश के हर कोने में है। सभी अपने अस्तित्व को बचाए रखने को लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं। छात्र राजनीति के पीछे भी देश और राज्य की राजनीति शामिल होती है। छात्र राजनीति में कई किरदार होते हैं जो अपनी भूमिका निभाते हैं। कोई हनुमान होता है तो कोई कुछ और।

राजस्थान में राजे-महाराजे वहां की राजनीति को नियंत्रित करते हैं, क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि राजनीतिक रूप से राजस्थान बिहार से सौ साल पीछे है? के सवाल पर चौधरी का जवाब था, "ऐसा लगता है कि यूपी-बिहार में जातिवाद ज्यादा है, पर सच्चाई यह है कि राजस्थान में जातिवाद ज्यादा है। यूपी और बिहार में मीडिया की जागरुकता ज्यादा है, इसलिए वहां की खबर तुरंत सुर्खियां बन जातीं हैं। पूरे देश में सबसे ज्यादा बलात्कार की घटना मध्य प्रदेश व राजस्थान में घटती है। जब यूपी का हाथरस कांड सूर्खी में था तब हाथरस जैसी दो घटनाएं राजस्थान में भी घटीं, पर दब गईं। जहां तक राजा-महाराजाओं की बात है, जयपुर में राजा का प्रभाव नहीं है, पर जोधपुर में राजा का प्रभाव ज्यादा है। यहां वीर भोग्या वसुंधरा जैसी भावना काम करती है। राजपूत संगठन बहुत हैं। ये संगठन राजा-महाराजाओं को अपना मेंटोर बना लेते हैं।" एक सवाल के उत्तर में चौधरी ने कहा, "शुरू में राजस्थान में लोग समझते थे कि यह जाट है। राजस्थान में यह बहुत कॉमन है कि पूछा जाए कि तुम किनके लड़के हो? इसका मतलब यह नहीं कि किसके लड़के हो, बल्कि यह होता है कि किस जाति से हो। जिस दिन किताब जनता स्टोर को लांच होना था वहां पूछा गया तुम चेहरे से जाट तो नहीं लगते?"

पोस्ट मंडल उभार में पिछड़ा, दलित की स्थिति पर चौधरी का उत्तर था कि मंडल के बाद दलित पिछड़ा का दबाव बढ़ा। मीणा राजस्थान की प्रभावी जाति है। सत्ता में जो रहता है, उसे पता होता है कि प्रभाव का इस्तेमाल कैसे होता है। माथुर, जोशी, शर्मा, सिंह भी प्रभावी हैं। चौधरी ने अपने उपन्यास में स्त्री जाति, लेखन की विचारधारा आदि से जुड़े सवालों के भी उत्तर दिए। उन्होंने कहा कि एक बहुत बड़ा तबका साहित्य से मरहूम है। चौधरी ने अपने पात्रों से जुड़े अनुभव को भी शेयर किया और कहा कि लिखते समय लेखक को अपने अंदर के किरदार को गढ़ना पड़ता है। स्थिति, परिस्थितियों को महसूस करना होता है। चौधरी ने सवाल जवाब सत्र में श्रोताओं के सवालों के भी उत्तर दिए। धन्यवाद ज्ञापन अन्विता प्रधान ने किया। अतिथियों को स्मृति चिन्ह व्यासजी ने दिया।

कलम पटना के प्रायोजक हैं श्रीसीमेंट। नवरस स्कूल ऑफ परफॉर्मिग आर्ट्स, हॉस्पीटैलिटी पार्टनर होटल चाणक्य, मीडिया पार्टनर दैनिक जागरण और अहसास वूमेन का सहयोग मिला।

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