Deepak-Ramola

Deepak Ramola

12th February 2021

बेहतर काम करने में कभी उम्र आड़े नहीं आतीः दीपक रमोला

कलम ओस्लो का वर्चुअल आयोजन हुआ, जिसमें अतिथि वक्ता के रूप में लेखक, कवि, वक्ता, अभिनेता और समाजसेवी दीपक रमोला ने शिरकत की। रमोला का स्वागत चंदर मेहता ने किया। सूत्रधार की भूमिका मनोज मिश्रा ने निभाई। उन्होंने महात्मा बुद्ध के प्रसिद्ध संदेश कि 'अपने व्यक्तित्व का निर्माण कभी भी बागीचा की तरह न बनाओ कि हर कोई उसमें टहलने लगे बल्कि खुद को आसमान की तरह बनाओ कि हर किसी में उसे छूने की ललक जगे' के उद्धरण के साथ रमोला से पहला सवाल पूछा कि विदेशों में बसे भारतीयों के लिए हिंदी का क्या महत्त्व है, विशेषकर तब जब भारतवासियों को अंग्रेजी लुभा रही है? रमोला का उत्तर था, "मिट्टी की खूशबू, आपसे में मिलने को भाषा बहुत आसान कर देती है। भाषा यह याद दिलाती है कि आपका वजूद एक बड़े हितैषी समाज का हिस्सा है।"

रमोला ने 2016 में यूरोपीय देशों में सीरियन रिफ्यूज़ी कैंप में काम करने के अपने अनुभव को सुनाया, जब किशोर कुमार के गाने सुन वे अफगानी रिफ्यूजियों के बीच पहुंच गए थे और आगे के दिनों में उनका काम आसान हो गया था। उन्होंने कहा, "भाषा ने मेरे लिए वह रास्ता खोला है, जो जुड़ने के लिए जरूरी है। किसी भी वस्तु की कद्र तभी होती है, जब आप उसे खो देते हैं। इसीलिए विदेशी भारतीयों के लिए आपकी भाषा आपको नॉस्टेल्जिया और ग्रेटीच्यूट से भर देती है। भारत के युवाओं में हिंदी की वर्तमान स्थिति के लिए हमसे पहले की जेनेरेशन भी कुछ हद तक जिम्मेदार है। स्कूलों में हिंदी सीखना एक पनिशमेंट की तरह है। हमें समझना चाहिए कि भाषा केवल शब्द नहीं है यह सिंटेक्स है। भाषा फूलों का एक गुलदस्ता है, जिसे आप अलग-अलग शब्दों को सजा सकते हैं।" रमोला ने तन्हां मुसाफिर सारा जहां है, घर से दूर घर कहां है...सुनाते हुए कहा कि एक भाषा को समझने के लिए दो भाषाएं आनी चाहिए। मेरा सौभाग्य है कि मुझे दोनों भाषाएं आती हैं। प्रोजेक्ट फ़्यूल से जुड़े सवाल पर रमोला ने बताया, "इसकी प्रेरणा मुझे मेरी मां से मिली, जिन्हें पांचवीं कक्षा में ही मेरी दादी ने स्कूल से यह कहकर निकाल दिया कि कोई भी लड़की लड़कों के स्कूल में नहीं पढ़ेगी। मेरी मां स्कूल भले ही नहीं गई थीं, पर हर मसले पर उनका विवेक बहुत कारगर साबित होता है। मैं सोचता था कि मेरी माता इतना विद्वान कैसे हैं। बच्चों को पालना किसी एमबीए से कम नहीं। उनका कहना है कि जिंदगी बहुत कुछ सिखाती है और जिंदगी से हम बहुत कुछ सीखते हैं। यहीं से मैं आम लोगों के जीवन की कहानियां जुटाने लगा। आज इस प्रोजेक्ट के तहत हम चार लाख से अधिक लोगों से जुड़ चुके हैं। मेरा मानना है कि आपकी उम्र विवेक से जुड़ी नहीं है।" उन्होंने बेल्जियम के एक छ साल के बच्चे अब्दुल से पूछे गए सवाल का उल्लेख किया कि जब मैंने उस बच्चे से पूछा कि तुमने जीवन से क्या सीखा? उसका उत्तर था, 'इससे पहले कि तुम बाइक चलाना सीखो, तुम्हें यह जानना चाहिए कि इसके ब्रेक कहां हैं?'

आपकी कविताएं बदल गईं या आपने पटकथा के चलते गाने लिखे? के उत्तर में रमोला ने कहा, "मेरे घर में किसी का भी दूर-दूर तक फिल्म इंडस्ट्री से रिश्ता नहीं है। मैं जब देहरादून में रह रहा था, तो मेरे अंदर की आवाज थी कि मुझे फिल्मों के लिए गीत लिखना चाहिए। वह अंदर की आवाज इतनी सशक्त थी कि मैंने खुद को ट्रेंड करना शुरू कर दिया। मैं जब स्कूल बस में जाता था, तो जो गाना सुनता था और उसमें पुराने गानों के शब्द हटाकर अपने शब्द जोड़कर लिखना सीखता था। ऐसा मैंने तीन हजार से अधिक गानों पर किया। उन्होंने 'पहला नशा' गीत के साथ अपने प्रयोग को भी सुनाया। रमोला ने कहा कि जब मैं मुंबई गया 2009 में तो मैं संदेश शांडिल्य से मिला, तो उन्होंने मेरी कविताएं सुनकर कहा कि इसे आपने ही लिखा है या आपके पिताजी ने? कविता आप चाहे जितनी लिख सकते हैं, पर फिल्मी गीत लिखने की एक सीमा है। आपको चरित्र और क्षेत्र का भी ध्यान रखना होता है।"

रमोला ने सूत्रधार मिश्रा के अनुरोध पर अपने काव्य संग्रह 'इतना तो मैं समझ गया हूं' से दोनों खिड़कियां नामक कविता सुनाई। रमोला ने कार्यक्रम में शामिल छात्रों से मुखातिब होते हुए कहा कि उन्हें कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए। पहली, आपको अपनी कहानी पर गर्व करना चाहिए। दूसरा, आपका हुनर आपको तोहफे में नहीं सौंपा गया, आपको जिम्मेदारी के रूप में मिला है। तीसरी और आखिरी बात, हमें भाषा का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने इस दौरान अपनी पुस्तक जीवन के पचास महत्वपूर्ण सवाल की भी चर्चा की, और उसमें से एक सवाल और उत्तर पढ़ कर सुनाया। रमोला ने प्रोजेक्ट फ़्यूल में शामिल 'वाइज वाल प्रोजेक्ट' के बारे में भी विस्तार से चर्चा की, जिसके तहत पलायन के चलते खंडहर बन चुके छह सौ साल पुराने सोड़ गांव की बंजर दीवारों की कहानियां उकेर दी गईं। उन्होंने दूसरे गांव खाती और तंजानिया की मसाई जनजाति के साथ चल रहे तीसरे प्रोजेक्ट की भी चर्चा की।

मिश्रा ने रमोला की बहुविध रुचियों में से उन्हें कौन सी सबसे अधिक प्रिय है? पूछा तो रमोला का उत्तर था, "मैं एक कवि हूं। जीवन को कविता के रूप में जीने की कोशिश करता हूं। लोगों से संवाद बेहतर होते हैं। अनुभव को सादगी से पिरोता हूं। उम्मीद करता हूं कि मैं खुद कविता बन जाऊं।" उन्होंने अपने जीवन के उद्धरण से कहा कि बच्चों को बेहतर काम करने के लिए कभी भी अपनी उम्र को आड़े नहीं आने देना चाहिए। आपको बहुत कुछ करना चाहिए। आपको जो कुछ भी आता है वह पूरी तरह खुल के करना चाहिए।

सवाल-जवाब के सत्र में उन्होंने वाणी खन्ना के सवाल पर कहा कि सत्रह साल की उम्र में कोई मुझे गंभीरता से नहीं लेता था। कोई अवसर मुहैया नहीं कराना चाहता था। पर मैं हारा नहीं निरंतर कोशिश की और आज यहां हूं। रमोला ने टाइम मैनेजमेंट से जुड़े सवाल का भी उत्तर दिया। हमेशा खुश रहने की वजह पूछे जाने पर उनका उत्तर था कि यह विश्वास कि कल बेहतर होगा, मुझे खुश रखता है। हैप्पीनेस सांग भी मदद करता है। कार्यक्रम के आखिर में कुलजस सागर ने कोई भी दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं कहते हुए कलम ओस्लो में उपस्थित अतिथियों और श्रोताओं का आभार प्रकट किया।

कलम ओस्लो के आयोजक थे प्रभा खेतान फाउंडेशन और विश्व हिंदू परिषद नॉर्वे

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