Rakshanda Jalil

11th June 2021

हमीं हम हैं तो क्या हम हैं...डॉ रक्षंदा जलील

लंदन के हिंदी प्रेमी श्रोताओं के लिए यह एक उम्दा शाम थी। आयोजन था प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से आयोजित कलम लंदन, अतिथि वक्ता थीं डॉ रक्षंदा जलील। वर्चुअल आयोजित इस कार्यक्रम में रक्षंदा का स्वागत किया डॉ पद्मेश गुप्त ने। उन्होंने कलम के आयोजनों की संक्षिप्त चर्चा की और आगे के संवाद के लिए वरिष्ठ पत्रकार परवेज आलम को आमंत्रित किया। आलम और रक्षंदा ने संवाद की शुरुआत विनोद दुआ की पत्नी चिन्ना दुआ को श्रद्धांजलि के साथ की। चिन्ना का असली नाम डॉ पद्मावती था। वह एक चिकित्सक, सिंगर, और सामाजिक कार्यकर्ता थीं और दो जबानों के बीच सेतु का माध्यम थीं। आलम ने रक्षंदा की साहित्यिक यात्रा में 25 से अधिक पुस्तकें और 50 से अधिक अकादमिक पत्र और निबंध का जिक्र करते हुए कहा कि हम विस्तार में न जाकर सीधे यह जानना चाहेंगे कि आप अपने को लिटरेरी हिस्टोरियन कहती हैं, यह क्या है? रक्षंदा का उत्तर था, "सरल भाषा में कहें तो जहां हिस्ट्री और लिटरेचर का मेल है। साहित्य की धारा जहां इतिहास से मिलती है वहां लिटरेरी हिस्टोरियन काम करता है। लिटरेचर टेक्स्ट और हिस्ट्री घटनाएं दर्ज करती है, जबकि हम उसके संदर्भ को देखते हैं। पिछले दस-पंद्रह सालों से मैं इतिहास और साहित्य के बीच इसी संदर्भ को टटोल रही हूं।"

तरक्की पसंद तहरीक और डॉ रशीद जहां से जुड़े सवाल पर रक्षंदा का उत्तर था, "जब हम नारीवादी लेखिकाओं की बात करते हैं तो उनके बेहतरीन कामों की चर्चा की बजाय उनकी खूबसूरती के बारे में बात करते हैं। हम फुटनोट क्यों तय करते हैं। साहित्य एक दरिया है। महिलाओं की जो बात लेखिका दर्ज कर सकती है, वह लेखक नहीं कर सकता। जब औरतें डॉक्टर ही नहीं थीं तो रशीद जहां ने जो देखा, लिखा। अंगारे, परदे के पीछे की ऐसी कहानी है, जिसे एक लेडी डॉक्टर ने दो बेगमों की जो गूफ्तगू सुनी, उसे हूबहू बयां कर दिया। लेखिका औरतों की जो छोटी से छोटी, बारीक चीज पकड़ सकती है, लिख सकती है, उसे कोई पुरुष नहीं लिख सकता।"

आप अपने बचपन को अन-कूल क्यों कहती हैं? रक्षंदा का उत्तर था, मेरा स्कूल बहुत फैशनेबल था। मेरी हिंदी बहुत उम्दा है। मेरी पॉकेट मनी का एक सोर्स यह भी था कि मैं हिंदी प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी। कार्यक्रम 'हिंदुस्तानी आवाज़' से जुड़े सवाल पर रक्षंदा का कहना था कि मैं हिंदी और उर्दू का जो रिश्ता है, इन जबानों के बीच काम करती हूं। हिंदी, उर्दू की अपनी एक तहजीब है। शेर को उठाना, सही जगह पर दाद देना, सही जगह पर चुप होना, सबका एक सलीका है। मेरा मकसद है कि साहित्य को समझने का तरीका बताना। अनुवाद से जुड़े वाक्य टेक्स्ट, कांटेक्स्ट और ट्रांसलेशन के जिक्र पर रक्षंदा ने 1992 में साहित्य अकादमी में डॉ के श्रीनिवासराव से हुई मुलाकात के बाद एक अनुवादक की अपनी यात्रा को खूंख्वार जानवर के मुंह में खून लगने से की और उदाहरण देकर समझाया कि साहित्यिक ट्रांसलेटर का काम सिर्फ तर्जुमा नहीं है, बल्कि एक लिटरेरी सेंसिबिलिटी का है। उन्होंने देश और दुनिया भर में हो रहे अनुवाद का भी जिक्र किया। इस बीच आलम ने इस शायरी के साथ साहित्यिक अनुवाद की मुश्किलों पर सहमति जताई।
हमें भी जलवागाह-ए-नाज़ तक ले चलो मूसा
तुम्हे ग़श आ गया तो हुस्न-ए-जाना कौन देखेगा.

रक्षंदा ने शहरयार, गुलज़ार, जावेद अख़्तर, कृष्ण चंदर, आदि पर अपने काम की चर्चा की। उन्होंने बताया कि उनकी पुस्तक 'बट यू डोन्ट लुक लाइक ए मुस्लिम' में रिलीजन, कल्चर, पॉलिटिक्स और आइडेंटेटी के तहत 40 निबंध संग्रहित हैं। रक्षंदा ने कहा कि हमें यह मान लेना चाहिए कि सेकुलरिज्म जैसे एक फैक्ट है वैसे ही सांप्रदायिकता भी एक सच्चाई है। आलम ने रक्षंदा के नाना प्रो अले अहमद सरूर का जिक्र किया तो रक्षंदा ने बहुत सी यादें शेयर कीं। कार्यक्रम का अंत डॉ पदमेश गुप्ता के धन्यवाद से हुआ, पर उससे पहले डॉ रक्षंदा ने यह शेर सुनाया-

चमन में इख्तिलाते रंग बू से बात करती है
हमीं हम हैं तो क्या हम हैं, तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो...

प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से आयोजित कलम लंदन के सहयोगी थे वातायन, यूके हिंदी समिति और वाणी फाउंडेशन।

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