Laxmi Narayan Tripathi

19th June 2021

प्रतिभा को लैंगिकता से जोड़ना गलतः आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी

"एक औरत होना आसान बात नहीं है। यह एक संघर्ष की शुरुआत भर है। जब मेरा जन्म हुआ तो घरवाले मुझे लड़का मानते थे, जबकि मैं लड़की थी। लोग आज भी पूछते हैं कि आपको कब पता चला कि आप अलग हैं? मैं कहती हूं, मुझे तो कभी पता नहीं चला। अलग होने का अहसास तो मुझे समाज ने कराया।" यह कहना है आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का। वह प्रभा खेतान फाउंडेशन और अहसास वूमेन की ओर से आयोजित कलम विशेष सत्र में बतौर अतिथि वक्ता मौजूद थीं। न्यूयॉर्क से अहसास वूमेन की सहयोगी उन्नति सिंह ने त्रिपाठी के स्वागत वक्तव्य और धन्यवाद दिया। फाउंडेशन की गतिविधियों और त्रिपाठी का संक्षिप्त परिचय भी उन्होंने दिया। सिंह ने कहा कि कोरोना के विपरीत दौर में भी फाउंडेशन ने वर्चुअल माध्यम से अपनी गतिविधियां जारी रखीं। फाउंडेशन भारत और विदेश के लगभग 30 शहरों में महिलाओं की तरक्की और कल्याण के कार्यक्रमों से जुड़ा है। साहित्य, संस्कृति, विरासत और कला से जुड़ी गतिविधियां इसकी पहचान हैं। 'कलम', 'एक मुलाकात', 'सुर और साज', 'लफ्ज़', 'आखर', 'किताब' और ऐसे कई कार्यक्रमों से फाउंडेशन कलाकारों, शिल्पकारों, साहित्यकारों, कारीगरों और सामाजिक हस्तियों को मंच उपलब्ध कराता है।

कलम विशेष के अतिथि वक्ता त्रिपाठी का परिचय देते हुए सिंह ने बताया कि सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता और किन्नर समाज को समानता का अधिकार दिलाने के लिए दुनिया भर में जानी जाने वाली शख्सियत त्रिपाठी का जन्म 13 दिसंबर, 1978 को महाराष्ट्र के ठाणे जिले के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। आप ट्रेंड डांसर और भरतनाट्यम में पोस्ट ग्रेजुएट हैं। आप कई टीवी कार्यक्रमों का चर्चित चेहरा रही हैं। किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर हैं। यूएनएड्स सिविल सोसाइटी टास्क फोर्स में एशिया प्रशांत क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के अलावा एशिया पैसिफिक ट्रांसजेंडर नेटवर्क सहित कई संस्थाओं की सदस्य तो कई की संस्थापक सदस्य, अध्यक्ष हैं। आप नालसा बनाम भारत संघ मामले में एक प्रमुख पक्षकार थीं जिसने भारत में ट्रांसजेंडर को समान अधिकार दिलवाया। आप कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, सरकारी, गैरसरकारी समितियों की सदस्य हैं। आपके जीवन को बॉलीवुड की कई फिल्मों में दिखाया गया है। आपकी दो आत्मकथात्मक पुस्तक छप चुकी है। त्रिपाठी से संवाद के लिए अहसास वूमेन जयपुर, राजस्थान और मध्य भारत की समन्वयक अपरा कुच्छल को आमंत्रित करते हुए सिंह ने कुच्छल का भी परिचय उम्दा कलाप्रेमी, स्थापित महिला उद्यमी और प्रतिष्ठित समाजसेवी के रूप में दिया।

कुच्छल ने कई पौराणिक पात्रों का उल्लेख करते हुए त्रिपाठी से सवाल किया कि आप अपने संघर्ष के बारे में बताइए? त्रिपाठी ने फाउंडेशन, अहसास वूमेन और कलम की सराहना की और कहा कि इससे जुड़कर बात करने में मुझे हमेशा खुशी होती है। जहां तक संघर्ष की बात है, जिंदगी खुद एक संघर्ष का नाम। अगर आप चलना सीख लें तो थोड़ा आसान हो जाता है। मेरी निजी जिंदगी में उतार चढ़ाव लगे ही रहे। सच कहूं तो संघर्ष ही जीवन है, जीवन ही संघर्ष है। पर हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम अपने अंदर की औरत को कभी मरने न दें। ट्रांसजेंडरों पर अपनी पुस्तकों से जुड़े सवाल पर त्रिपाठी ने कहा, "जब वैशाली रोड़े ने 'मैं हिजड़ा, मैं लक्ष्मी' को लेकर मुझसे बात की तो मैंने कहा था कि आप भरी जवानी में मुझे बूढ़ा बना रही हैं। उनका कहना था कि ट्रांसजेंडरों की खुली जिंदगी पर कोई किताब नहीं है, इसलिए मेरी जीवन यात्रा पर वह किताब मराठी, फिर हिंदी और अंग्रेजी में आई। स्त्री जब किसी बड़े पद पर होती है तो उस पर प्रहार होता ही है। रेड लिपस्टिकः द मेन इन माई लाइफ में मेरी जिंदगी के सारे मर्द, जिनमें मेरे पिता भी शामिल हैं पर लिखी पुस्तक है। मुझे लगा कि एक तीसरी किताब नारी की नजर से धर्म पर आनी चाहिए, तो इस पर भी काम हो रहा है।"

गुरु चेला परंपरा एक पवित्र रिश्ता है, इसे आप कैसे साधते हैं? के उत्तर में त्रिपाठी ने कहा, "गुरु बिना ज्ञान कहां? गुरु जिंदगी में जरूरी है। किन्नर समाज में हर चेले को गुरु चुनने का हक है। जब मैं चेला बनी तब रुढ़ी परंपरा है। पर आज यह बदल रही है। मेरे खानदान में अलग-अलग चेले हैं, सब एक दूसरे से अलग हैं। मेरा मानना है कि सभी आधुनिक बनें पर अपनी परंपरा के साथ। यह जो विकास है वह संस्कृति के साथ आगे बढ़े, रुढ़ियां खत्म हों पर परंपरा खत्म न हो, उसका सार बना रहे।" शिक्षा का महत्त्व क्या है, आप किन्नर समुदाय के लिए क्या कर रही हैं? के सवाल पर त्रिपाठी का उत्तर था, "आज किन्नर माताएं अच्छे स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ा रही हैं। पर मैं सोचती हूं, स्कूल से अधिक ज्ञान होना जरूरी है। सीखना मुझे बहुत पसंद है। आचार्य की गद्दी पर होने का अर्थ नहीं कि हमें सब कुछ आता है। ज्ञान हो, सही ज्ञान हो।" किन्नर समुदाय की स्वीकार्यता और लोगों के दृष्टिकोण? पर त्रिपाठी का उत्तर था, "लोगों की सोच बदलिए। लड़का या लड़की होने की जगह एक भारतीय होना जरूरी है। किसी की प्रतिभा को लैंगिकता से जोड़ना गलत है। हमें यह विभेदकारी नीति बदलनी होगी।"

किन्नर समुदाय के लिए संघर्ष? पर त्रिपाठी ने कहा कि मैं अपने आत्म सम्मान और वजूद के लिए लड़ी। अपने लिए न्यायालय जाकर लड़ना हमारी बाध्यता थी। किसी भी समाज को अपना हक पाने के लिए कानून एक बड़ा स्तंभ है। हमारे संविधान ने एक नागरिक के रूप में सभी को समान अधिकार दिया है। पर किन्नर क्या, व्यवहार में नारी को भी उसका सम्मान नहीं मिला है। रजिया सुल्तान, रानी लक्ष्मी बाई, अहिल्याबाई होल्कर, सावित्रीबाई फुले और इंदिरा गांधी के देश में हमें त्रिपुर सुंदरी जगदंबा की कृपा से अपना हक ललकार कर लेना चाहिए। यूएन में मिले सम्मान के बाद देश में आपके लिए कुछ बदला? के उत्तर में त्रिपाठी ने कहा कि यूएस में कानूनी समानता बहुत है। हमारे यहां बहुत अंतर है। यहां एक वर्ग में तो बहुत सम्मान था तो सामान्य लोगों के लिए मैं वही किन्नर थी। लेकिन मैं लोगों के कटाक्ष के लिए भी आभारी हूं। उसी के चलते मैं यहां तक पहुंची। किन्नर समुदाय की वर्तमान स्थिति के लिए ब्रिटिश शासन को जिम्मेदार ठहराते हुए त्रिपाठी ने कहा कि उन्होंने थर्ड जेंडर को लेकर जो नीति एशियन प्रशांत इलाके में बनाई वह गलत थी। ब्रिटिशर्स ने समाज में भ्रांतियां फैलाई, जो आज भी कायम हैं। उम्मीद है आने वाली सदी में ये भ्रांतियां खत्म होंगी।

कुच्छल के अन्य सवालों के उत्तर में त्रिपाठी ने कहा कि तमाम दावों के बीच भी जो सफलता औरत को चाहिए वह आज भी नहीं मिली। फिर भी अनेकता में एकता जरूरी है। हमारा एकत्रित विश्वास ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। माइक्रोमीटर वाली लक्ष्मी से महामंडलेश्वर तक की यात्रा के पीछे लंबा संघर्ष रहा। पाश्चात्य से भारतीय, अधीर से संतुलित होकर मुझे अपनी पहचान मिली और क्या चाहिए। कोरोना दौर के अपने प्रयासों की चर्चा के बीच उन्होंने की कि वैक्सीनेशन बहुत जरूरी है। मास्क पहनना, सेनिटाइजर लगाना, दो गज की दूरी जरूरी है, कोरोना कहीं गया नहीं है। त्रिपाठी ने कहा कि मेरी मां ने सिखाया कि सब कुछ समाजोन्मुख होना चाहिए। सत्य से बड़ा कोई तप नहीं, झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं। सत्य से जीना जो सीख गया, उसका कोई कुछ नहीं कर सकता। अब मेरे बचपन का अंधेरा खत्म हो चुका है। मेरी जिंदगी में अब सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश है। सत्य की रोशनी मुझे हमेशा घेरे रखे।

अलका बत्रा, दीपा मिश्रा, महेश शर्मा, उर्मी, जाह्न्वी, गुरुलीन, दुर्गा प्रसाद अग्रवाल, प्रणीत, अशोक माथुर, प्रभात रंजन और किरण राजपुरोहित आदि श्रोताओं के अलग-अलग सवालों का बखूबी उत्तर त्रिपाठी ने दिया। उन्होंने कहा कि आचार्य महामंडालेश्वर की उपाधि के साथ एक बड़ा दायित्व है। समाज में जो धारणा है पुरुष प्रधान समाज की, उसे बदलने में किन्नर अखाड़े की बड़ी भूमिका है। इतिहास में किन्नरों को सम्मान मिला पर आधुनिक भारत में उन्हें क्यों सताया गया का सवाल पुरुष प्रधान समाज से होना चाहिए, जिसने मां के आंचल से बच्चों को अलग कर दिया। जिन्हें उपदेवता कहा गया उन्हें एक रोटी के लिए अपना तन क्यों बेचना पड़ा।

नौकरियों में आरक्षण के सवाल पर त्रिपाठी ने कहा कि आरक्षण का नाटक बंद हो। काबिलियत पर नौकरी मिले। सभी समान हों। समाज को संवेदनशील बनाने की योजना पर त्रिपाठी ने कहा कि हमारे बच्चों को सिखाना चाहिए लिंग क्या है, लैंगिकता, सेक्सुअलिटी क्या है। उन्होंने एचआईवी एड्स और कमाठीपुरा सेक्स वर्कर से जुड़े अपने जीवन के निर्णयात्मक क्षण की भी चर्चा की और कहा अनकंडीशनल लव की बराबरी कोई नहीं कर सकता।

त्रिपाठी ने कहा महामंडलेश्वर के रूप में धर्म रक्षा का दायित्व है। पर इसका असली अर्थ है कि हम धर्म में शरणागत होकर रहें। धर्म स्वयं में प्रबल है, वह अपनी रक्षा करने के साथ ही समाज और मनुष्य की रक्षा करने में सक्षम है। आज धर्म की परिभाषा अलग है। धर्मो रक्षति रक्षितः की यह मेरी अपनी व्याख्या है। नारी हो या किन्नर जब मां अपने बच्चों के लिए पति के विरुद्ध भी खड़ी हो जाएंगी, समाज बदल जाएगा। त्रिपाठी ने कहा कि हमारी पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी को समझना है। आने वाली पीढ़ी संवेदनशील है, बदल रही है। हमें इस बदलाव का हिस्सा बनना होगा। प्रकृति का स्वभाव है, बदलाव।

कलम विशेष के प्रायोजक हैं श्री सीमेंट।

Pictures

Apra-Kuchhal
Laxmi-Narayan-Tripathi
Unnati-Singh
Deepa-Mishra

Media Coverage

Video