भगवानदास मोरवाल

लेखक भगवानदास मोरवाल के अनुभव का विशाल संसार उनके लेखन में बखूबी झलकता है. ये अनुभव संभवतः उन्हें अपनी मिट्टी मेवात और भारत सरकार के केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड में काम करने के दौरान मिले. उनका पहला कहानी संग्रह 'सिला हुआ आदमी' साल 1986 में छपा. फिर 'सूर्यास्त से पहले', 'अस्सी मॉडल उर्फ सूबेदार', 'सीढ़ियां', 'मां और उसका देवता', 'लक्ष्मण-रेखा' और 'दस प्रतिनिधि कहानियां' छपा. इस बीच कविता संग्रह 'दोपहरी चुप है' और बच्चों के लिए 'कलयुगी पंचायत' नामक पुस्तक भी छपी. उन्होंने हिन्दी की 'श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं' और 'इक्कीस श्रेष्ठ कहानियां' का संपादन भी किया.

हिन्दी से स्नातकोत्तर और पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल करने वाले मोरवाल ने कहानियों से शुरुआत की और उपन्यासों से प्रसिद्ध हुए. उनका जन्म हरियाणा के मेवात में 23 जनवरी, 1960 को हुआ था. अपने उपन्यास 'काला पहाड़', 'बाबल तेरा देस में', 'रेत' तथा 'नरक मसीहा' से खूब शोहरत बटोरी. उनकी किताबों के उर्दू सहित अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं. उन्हें अब तक 'श्रवण सहाय एवार्ड’, 'जनक विमेहर सिंह सम्मान’, 'हरियाणा साहित्य अकादमी', 'अंतरराष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान’, 'शब्द साधक ज्यूरी सम्मान’,'कथाक्रम सम्मान’, हिन्दी अकादमी दिल्ली का 'साहित्यकार सम्मान’, दो बार 'साहित्यिक कृति सम्मान’, 'राजाजी सम्मान’, 'डॉ अम्बेडकर सम्मान’, भारतीय दलित साहित्य अकादमी व पत्रकारिता के लिए 'प्रभादत्त मेमोरियल एवार्ड’ व 'शोभना एवार्ड’ मिल चुका है. वह हिन्दी अकादमी दिल्ली एवं हरियाणा साहित्य अकादमी के सदस्य भी रहे हैं.

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