प्रत्यक्षा

प्रत्यक्षा लिखती हैं, सोचती गुनती हैं, पावरग्रिड में वित्त विभाग की नौकरी करती हैं, संगीत और लिबरल आर्ट में रूचि रखती हैं, इतिहास और समय के रहस्य में मनुष्य़ के अस्तित्व का सन्दर्भ खोजती हैं। हरेक महादेश में एक बार घूम लेना, हर समन्दर के पानी को छू लेने की ख्वाहिश रखती हैं, इन जगहों के लोगों से मिल लेना, उनका खाना चख लेना, उनकी भाषा सीख लेना, माने ये कि इस एक जीवन में अनेक जीवन जी लेने की तमन्ना रखती हैं। प्रत्यक्षा का जन्म बिहार के गया में 26 अक्टूबर, 1963 में हुआ। इनके लेखन की शुरुआत ब्लॉग लेखन से हुई। 2003 में खुद ब्लॉग बनाकर लिखना शुरू किया और जल्द ही पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। आपने अब तक कई पुस्तकें लिखीं हैं और इनके लिए सम्मान भी हासिल किया है।

आप हिंदी के साथ ही अंग्रेजी में भी लिखती हैं और अनुवाद भी करती हैं। आपकी चर्चित पुस्तकों में 'जंगल का जादू तिल-तिल', 'पहर दोपहर, ठुमरी', ‘बारिशगर’, 'तुम मिलो दोबारा', 'तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है', 'ग्लोब के बाहर लड़की', 'एक दिन मराकेश', 'मीट मी टुमॉरो' 'रेन सांग' आदि शामिल हैं। आपने मुक्तिबोध पर लेख और उनकी कुछ कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद भी किया है। आपको लेखन के लिए कई सम्मान मिल चुके हैं, जिनमें सोनभद्र कथा सम्मान, इंडो नॉर्वेजियन पुरस्कार, राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान शामिल है। आपको कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप मिल चुकी है साथ ही आप संगम हाउस रेजिडेंसी की फेलो भी रही हैं।

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