सत्य व्यास

    सत्य व्यास आज के दौर के लेखक हैं, जिन्होंने पहले बनारस के बारे में लिखा, फिर दिल्ली के बारे में. काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लॉ स्कूल से स्नातक रहे व्यास की रूचि लेखन के अलावा घुमक्कड़ी, फिल्म और क्रिकेट में है. उनकी पहली किताब 'बनारस टॉकिज' खूब बिकी. वह लेखन की उस धारा का हिस्सा हैं, जिसने खुद को नए जमाने का पैरोकार माना और अपनी भाषा को नई हिंदी का नाम देते हुए अपनी रचनात्‍मक शक्‍ति, ऊर्जा और अस्‍तित्‍व की तलाश की. वह आज की पीढ़ी की तरह ही सोच रखते हैं.

    उनके खुद के शब्दों में अस्सी के दशक में बूढ़े हुए, नब्बे के दशक में जवान, इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में बचपना गुजरा और अब नई सदी के दूसरे दशक में पैदा हुए हैं. अब जब पैदा ही हुए हैं तो खूब उत्पात मचा रहे हैं. सत्य व्यास चाहते हैं कि उन्हें कॉस्मोपॉलिटन कहा जाए. वह कहां, कब और क्यों रहते हैं, इसका खुद उन्हें भी पता नहीं होता. कभी भूटान तो कभी राउरकेला. 'जियो, औरों को भी जीने दो' के धर्म में विश्वास करते हैं और एक साथ कई-कई चीजें लिखते हैं. अंतर्मुखी हैं इसलिए फोन की जगह ईमेल पर ज्यादा मिलते हैं. इनके दूसरे उपन्यास ‘दिल्ली दरबार’ ने भी बिक्री का कीर्तिमान बनाने के साथ इन्हें ख़ूब चर्चा दिलाई.

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